
रायपुर। सुशासन केवल योजनाएं बनाने या घोषणाएं करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसकी वास्तविक कसौटी यह होती है कि शासन की सुविधाएं और सेवाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितनी सहजता, पारदर्शिता और समयबद्ध तरीके से पहुंचती हैं। छत्तीसगढ़ में आयोजित सुशासन तिहार इसी सोच को जमीन पर उतारने की एक पहल के रूप में सामने आया।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में गत माह संचालित इस अभियान का उद्देश्य गांवों और शहरों में सीधे पहुंचकर लोगों की समस्याएं सुनना, उनके समाधान की दिशा में कार्रवाई करना और शासन तथा जनता के बीच संवाद को मजबूत बनाना था। बस्तर के दूरस्थ इलाकों से लेकर सरगुजा और धमतरी के आदिवासी अंचलों तक लोगों को अपनी जरूरतें सीधे प्रशासन और सरकार के सामने रखने का अवसर मिला।
अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे प्रशासन, यही है सुशासन की कसौटी
सुशासन का मूल भाव लोक-केंद्रित, जवाबदेह और पारदर्शी प्रशासन से जुड़ा है। इसका अर्थ ऐसा तंत्र है, जिसमें आम नागरिक की आवाज को महत्व मिले और सरकारी योजनाओं का लाभ बिना अनावश्यक बाधाओं के जरूरतमंद तक पहुंचे।
सुशासन तिहार के दौरान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति का जायजा लिया। ग्रामीणों ने चौपालों में पेयजल, हैंडपंप, तालाब घाट, सामुदायिक भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, पहुंच मार्ग, बिजली विस्तार, मध्यान्ह भोजन और स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति जैसी स्थानीय जरूरतों को सामने रखा।
इस पहल का उद्देश्य केवल शिकायतें दर्ज करना नहीं, बल्कि प्रशासन को लोगों के बीच ले जाकर वास्तविक स्थिति को समझना भी था।
चौपाल में पहुंची सरकार, लोगों ने खुलकर रखी बात
सुशासन तिहार के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 15 से 20 ग्राम पंचायतों के समूह और शहरी क्षेत्रों में वार्ड क्लस्टर स्तर पर शिविर आयोजित किए गए। अभियान के दौरान आम लोगों को अपनी समस्याएं और विकास से जुड़ी आवश्यकताएं सीधे अधिकारियों के सामने रखने का अवसर मिला।
मुख्यमंत्री के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में आकस्मिक दौरों ने भी अभियान को अलग पहचान दी। तपती गर्मी के बीच जब प्रदेश के मुखिया दूरस्थ गांवों में पहुंचे, तो ग्रामीणों ने अपनी रोजमर्रा की समस्याओं और सार्वजनिक जरूरतों को खुलकर उनके सामने रखा।
कई स्थानों पर छोटी लेकिन महत्वपूर्ण जनसुविधाओं से जुड़ी मांगों पर त्वरित निर्णय भी लिए गए। इससे ग्रामीणों में यह संदेश गया कि प्रशासनिक व्यवस्था केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ने पर गांव तक पहुंच सकती है।
1 मई से 10 जून तक चला अभियान
वर्ष 2026 में पूरे प्रदेश में 1 मई से 10 जून तक सुशासन तिहार का आयोजन किया गया। इस दौरान गांव, गरीब और किसानों से जुड़ी समस्याओं को प्राथमिकता के साथ समझने और उनके निराकरण की दिशा में काम किया गया।
प्रदेश के सभी 33 जिलों और 146 विकासखंडों में अभियान के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों की टीमें गठित की गईं। ये दल गांवों तक पहुंचे और कई स्थानों पर रात्रि विश्राम कर चौपालों के माध्यम से ग्रामीणों से सीधा संवाद किया।
राज्य की 11 हजार 693 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आने वाले करीब 19 हजार 820 गांवों तक अभियान की पहुंच बनाने का प्रयास किया गया। हजारों अधिकारी और कर्मचारी अलग-अलग समूहों में ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण करते रहे।
सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत का भी हुआ आकलन
सुशासन तिहार के दौरान केवल समस्याओं को सुनने तक अभियान सीमित नहीं रहा। विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की स्थिति की भी समीक्षा की गई।
मुख्यमंत्री, जिलों के प्रभारी मंत्री और प्रभारी सचिवों ने अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा कर अभियान की गतिविधियों का जायजा लिया। त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भागीदारी भी इसमें रही।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अंत्योदय अन्न योजना, खाद्यान्न के भंडारण और वितरण व्यवस्था की समीक्षा की गई। पहुंचविहीन इलाकों में मानसून से पहले जरूरी वस्तुओं के पर्याप्त भंडारण की स्थिति पर भी ध्यान दिया गया। बीपीएल परिवारों के लिए अमृत नमक वितरण जैसे विषयों की भी समीक्षा की गई।
रोजगार, राजस्व और बुनियादी सुविधाओं पर रहा फोकस
अभियान के दौरान महात्मा गांधी नरेगा और अन्य रोजगारमूलक योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई। श्रमिकों को समय पर मजदूरी मिल रही है या नहीं, इस स्थिति को भी देखा गया।
राजस्व मामलों में नामांतरण, बंटवारा और सीमांकन जैसे विवादरहित प्रकरणों के निराकरण की प्रगति पर ध्यान दिया गया। इसके अलावा पेयजल व्यवस्था, जलस्रोतों की सफाई, स्वच्छता अभियान, निर्मल ग्राम योजना और बिजली व्यवस्था की स्थिति की भी समीक्षा की गई।
ट्रांसफार्मरों और बिजली लाइनों के रखरखाव, कृषि पंपों के विद्युतीकरण तथा एकल बत्ती कनेक्शन से जुड़े कार्यों की प्रगति का भी आकलन किया गया। ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और निराश्रित पेंशन जैसी व्यवस्थाएं भी समीक्षा के दायरे में रहीं।
संवाद से भरोसे तक की पहल
सुशासन तिहार ने प्रशासन और जनता के बीच सीधे संवाद का एक मंच तैयार करने का प्रयास किया। जब दूरस्थ गांव का व्यक्ति अपनी जरूरत बिना किसी औपचारिक दूरी के शासन तक पहुंचा सके, तो यही व्यवस्था जनभागीदारी को मजबूत करती है।
बस्तर का आयतु हो, सरगुजा का तिहारू हो या धमतरी के नगरी अंचल का कोई ग्रामीण, यदि वह सरकारी राशन, पेयजल, बिजली, सड़क या किसी अन्य बुनियादी सुविधा के बारे में खुलकर सवाल कर सकता है और उसके समाधान की उम्मीद रखता है, तो यही सुराज की उस अवधारणा को मजबूत करता है जिसमें शासन का केंद्र आम नागरिक होता है।
सुशासन की असली पहचान आखिरकार बड़े भवनों और बड़ी घोषणाओं से नहीं, बल्कि उस भरोसे से बनती है, जब अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति यह महसूस करे कि सरकार और प्रशासन तक उसकी पहुंच है।




















