
दिल्ली : कथित 650 करोड़ रुपये के दवा और चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले की जांच में एक गंभीर जानकारी सामने आई है। एंटी करप्शन ब्रांच ने अदालत को बताया है कि घोटाले से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण फाइलें सिर्फ गायब नहीं हुईं, बल्कि उन्हें नष्ट किए जाने की आशंका है। जांच एजेंसी के मुताबिक इन दस्तावेजों में खरीद प्रक्रिया से लेकर अस्पतालों तक सामान पहुंचने और भुगतान होने तक की अहम जानकारी मौजूद हो सकती थी।
18 मई को रिकॉर्ड लेने पहुंची थी जांच टीम
जांच टीम 18 मई 2026 को दिल्ली सरकार की केंद्रीय खरीद एजेंसी CPA से रिकॉर्ड लेने पहुंची थी। उस दौरान घोटाले से जुड़ी कई महत्वपूर्ण फाइलें उपलब्ध नहीं कराई गईं। बाद की जांच में एसीबी ने अदालत के सामने दावा किया कि पहले जिन सात फाइलों के लापता होने की जानकारी सामने आई थी, उनमें से महत्वपूर्ण दस्तावेजों को नष्ट किया गया है।इन रिकॉर्ड के जरिए टेंडर की शर्तों, खरीद दरों, आपूर्ति, स्टाक और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच को आगे बढ़ाया जा सकता था।
महंगे दाम पर उपकरण खरीदने के आरोप
जांच में कई चिकित्सा उपकरणों और जरूरी सामान की खरीद पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि करीब 10 लाख रुपये की कीमत वाली पोर्टेबल एक्स-रे मशीन लगभग 33 लाख रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदी गई। 448 मशीनों की खरीद पर करीब 148 करोड़ रुपये खर्च होने की बात सामने आई है, जबकि इनकी अनुमानित बाजार कीमत करीब 45 करोड़ रुपये बताई गई है।इसी तरह सी-आर्म मशीनों को करीब 25 लाख रुपये की अनुमानित कीमत के मुकाबले लगभग 1.10 करोड़ रुपये प्रति मशीन की दर से खरीदने का आरोप है।
बेडशीट और ओआरएस की खरीद भी जांच के घेरे में
घोटाले की जांच में अस्पतालों के लिए खरीदी गई अन्य सामग्री की दरों पर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि करीब 150 रुपये की बेडशीट लगभग 450 रुपये में खरीदी गई और इस मद में करीब 75 करोड़ रुपये खर्च किए गए।ओआरएस के करीब 50 लाख सैशे की खरीद पर लगभग 7.50 करोड़ रुपये खर्च होने का रिकॉर्ड बताया गया है। आरोप यह भी है कि करीब 2.05 रुपये की अनुमानित कीमत वाले सैशे के लिए लगभग 15 रुपये प्रति सैशे का भुगतान किया गया।
नष्ट फाइलों में कौन सी जानकारी थी
जांच एजेंसी के अनुसार अलग-अलग फाइलों में घोटाले की कई अहम कड़ियां मौजूद थीं। इनका मिलान अस्पतालों में उपलब्ध रिकॉर्ड और डिजिटल दस्तावेजों से किया जा सकता है।
बेडशीट और लिनेन का रिकॉर्ड
एक फाइल में करीब 16.67 लाख वस्तुओं की खरीद और लगभग 75 करोड़ रुपये के खर्च का विवरण बताया गया है। इससे अस्पतालवार सप्लाई, स्टाक और वास्तविक खपत की जांच संभव थी।
ओआरएस खरीद का पूरा हिसाब
ओआरएस से जुड़ी फाइल में करीब 50 लाख सैशे की खरीद और लगभग 7.50 करोड़ रुपये के खर्च का रिकॉर्ड था। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती थी कि किस अस्पताल को कितनी मात्रा भेजी गई और कितना स्टाक बचा।
सी-आर्म मशीनों की खरीद
रेडियोलाजी से जुड़ी फाइल में सात सी-आर्म मशीनों की लगभग 7.70 करोड़ रुपये की खरीद का विवरण बताया गया है। रिकॉर्ड मिलने पर मशीनों की सप्लाई पाने वाले अस्पताल और उनकी मौजूदा स्थिति का सत्यापन किया जा सकता था।
सर्जिकल सामग्री की बड़ी खरीद
एक अन्य फाइल में 100 करोड़ रुपये से अधिक की सर्जिकल सामग्री की खरीद का विवरण होने की बात कही गई है। इसमें ड्रेसिंग सामग्री, टांके, कैनुला और दस्ताने जैसी जरूरी वस्तुएं शामिल थीं। इनके आधार पर खरीद की मात्रा, कीमत और अस्पतालों तक हुई सप्लाई का मिलान किया जा सकता था।
करीब 400 करोड़ की दवा खरीद पर भी नजर
जरूरी दवाओं से संबंधित फाइल को जांच के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें करीब 400 करोड़ रुपये की दवाओं की खरीद का विवरण होने की बात कही गई है। इस रिकॉर्ड के जरिए कंपनियों से हुई खरीद, अस्पतालों को भेजी गई दवाओं और स्टाक रजिस्टर के आंकड़ों की तुलना की जा सकती थी।
डिजिटल रिकॉर्ड से जांच को मिल सकती है नई दिशा
फाइलों के नष्ट होने के बावजूद जांच पूरी तरह दस्तावेजों पर निर्भर नहीं है। एसीबी ई-टेंडर, भुगतान, लेखा और स्टाक से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड के जरिए कई जानकारियां दोबारा जुटा सकती है।
इन डिजिटल दस्तावेजों से टेंडर जारी होने से लेकर खरीद की मंजूरी, सामान की आपूर्ति और भुगतान पाने वाली कंपनियों तक की कड़ी जोड़ने में मदद मिल सकती है। अब जांच का अहम हिस्सा यह पता लगाना भी होगा कि संवेदनशील फाइलों को किस परिस्थिति में हटाया या नष्ट किया गया और इसके पीछे किसकी भूमिका थी।




















