Bastar News: विश्व आदिवासी दिवस और विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा से ठीक पहले बस्तर में आदिवासी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को लेकर विवाद गहरा गया है। बुधवार को सामने आए दो अलग-अलग घटनाक्रमों ने प्रशासन और आदिवासी समाज के बीच तनाव बढ़ा दिया। एक ओर देवस्थल पर पूजा की अनुमति नहीं मिलने से समाज के प्रतिनिधियों ने प्रशासन की बैठक का बहिष्कार कर दिया, वहीं दूसरी ओर बस्तर दशहरा की आधिकारिक कार्यक्रम रूपरेखा में मुरिया दरबार की जगह आम दरबार लिखे जाने पर भी कड़ा विरोध दर्ज कराया गया।

बैठक में पूजा की अनुमति नहीं मिलने पर हुआ बहिष्कार

कलेक्ट्रेट के आस्था सभाकक्ष में विश्व आदिवासी दिवस के आयोजन, सुरक्षा व्यवस्था, यातायात और कानून व्यवस्था को लेकर जिला प्रशासन ने समाज के प्रतिनिधियों के साथ बैठक आयोजित की थी।बैठक के दौरान आदिवासी समाज के पदाधिकारियों ने प्रतापगंज पारा स्थित देवस्थल पर पारंपरिक पूजा-अर्चना की अनुमति देने की मांग रखी। उनका कहना था कि बस्तर में किसी भी बड़े सामाजिक या धार्मिक आयोजन की शुरुआत इसी देवस्थल पर पूजा से होती है और विश्व आदिवासी दिवस भी उसी परंपरा का हिस्सा है।समाज की ओर से यह भी प्रस्ताव रखा गया कि यदि भीड़ को लेकर प्रशासन को चिंता है तो केवल समाज प्रमुखों और पुजारियों को सीमित संख्या में पूजा करने की अनुमति दी जाए। हालांकि प्रशासन की ओर से इस पर सहमति नहीं बनी। इसके बाद समाज के प्रतिनिधियों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया।

क्या है देवस्थल विवाद?

प्रतापगंज पारा स्थित जमीन को लेकर विवाद काफी समय से चल रहा है। जानकारी के अनुसार पहले इस भूमि को सरकारी पार्किंग के लिए चिन्हित किया गया था, लेकिन बाद में इसका आवंटन दिगंबर जैन समाज को कर दिया गया।आदिवासी समाज के एक वर्ग का दावा है कि यह उनका पारंपरिक देवस्थल है। समाज के लोगों ने यहां पारंपरिक रीति से पूजा और बलि देकर इस स्थान पर अपना अधिकार जताया था। उनकी मांग है कि जमीन का आवंटन निरस्त कर इसे आदिवासी समाज को सौंपा जाए। फिलहाल यह मामला संवेदनशील बना हुआ है और प्रशासन तथा न्यायालय के अगले कदम पर सभी की नजर है।

बस्तर दशहरा की रूपरेखा पर भी उठा विवाद

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के आधिकारिक कार्यक्रम और पूजा विधान कार्ड में मुरिया दरबार की जगह आम दरबार प्रकाशित होने पर भी आदिवासी समाज ने आपत्ति जताई है। समाज का कहना है कि यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा विषय है और इसमें बदलाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।समाज के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपते हुए कार्यक्रम में सुधार की मांग की है।

मुरिया दरबार की परंपरा का दिया हवाला

आदिवासी समाज का कहना है कि वर्ष 1875 से बाहर रैनी के दूसरे दिन सिरहासार भवन में मुरिया दरबार आयोजित होता आ रहा है। ऐसे में आधिकारिक दस्तावेज में इसका नाम बदलकर आम दरबार प्रकाशित करना परंपरा और इतिहास के साथ छेड़छाड़ है।वहीं दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी ने कहा कि कार्यक्रम की रूपरेखा में अक्सर आम दरबार लिखा जाता है, जबकि प्रशासन द्वारा जारी निमंत्रण पत्रों में मुरिया दरबार का उल्लेख किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि राजपरंपरा के समय से भी कई दस्तावेजों में आम दरबार शब्द का इस्तेमाल होता रहा है।

प्रशासन और समाज के बीच बढ़ी संवेदनशीलता

विश्व आदिवासी दिवस और बस्तर दशहरा जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों से पहले सामने आए इन दोनों विवादों ने क्षेत्र का माहौल संवेदनशील बना दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन और आदिवासी समाज के बीच बातचीत से समाधान निकलता है या यह विवाद आगे और गहराता है।

Leave a reply

Please enter your name here
Please enter your comment!