

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में न्यायिक अभिरक्षा में बंद एक आरोपी को अदालत ले जाते समय गंभीर लापरवाही बरतने और उसके फरार होने के मामले में बर्खास्त किए गए दो आरक्षकों को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने दोनों की सेवा बहाली की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अब इस फैसले के खिलाफ दोनों आरक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की है, जिसकी सुनवाई 13 जुलाई 2026 को तय की गई है।
क्या है पूरा मामला? लापरवाही से आरोपी हुआ फरार
यह मामला वर्ष 2006 का है, जब रायपुर में पदस्थ दो आरक्षक सुरेश यादव और बुधना राम भगत को एक आरोपी राहुल उर्फ अशोक शिंदे को राजनांदगांव न्यायालय में पेश करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
आरोप है कि सुरक्षा में गंभीर चूक के चलते आरोपी को पावर हाउस क्षेत्र में बिना पर्याप्त निगरानी के छोड़ा गया, जहां उसने एक व्यापारी से उगाही भी की। इसके बाद उसे निजी वाहन से राजनांदगांव ले जाया गया, लेकिन रास्ते में उसे दुकानों और रिश्तेदारों के घर जाने की अनुमति दी गई। इसी दौरान वह पुलिस अभिरक्षा से फरार हो गया।
विभागीय जांच में आरोप साबित, सेवा से किया गया बर्खास्त
घटना के बाद विभागीय जांच शुरू की गई। जांच अधिकारी ने दोनों आरक्षकों पर लगे आरोपों को गंभीर और प्रमाणित माना।
रिपोर्ट के आधार पर 23 दिसंबर 2006 को दोनों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। बाद में उनकी विभागीय अपील 16 मई 2007 को भी खारिज कर दी गई। इसके साथ ही उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 223 के तहत आपराधिक मामला भी दर्ज हुआ।
आपराधिक मामले में राहत, लेकिन विभागीय कार्रवाई जारी
वर्ष 2015 में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने आपराधिक मामले में दोनों को राहत प्रदान की। इसी आधार पर आरक्षकों ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर सेवा बहाली की मांग की।
उनका तर्क था कि जब आपराधिक अदालत से उन्हें बरी कर दिया गया है, तो विभागीय कार्रवाई भी समाप्त मानी जानी चाहिए।
राज्य सरकार का पक्ष: दोनों मामले अलग प्रकृति के
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि आपराधिक मामला और विभागीय जांच अलग-अलग प्रकृति के हैं। विभागीय जांच में कर्तव्य में गंभीर लापरवाही, सुरक्षा में चूक और आरोपी को फरार होने देने जैसे आरोप साबित हुए हैं।
सरकार ने कहा कि विभागीय जांच में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद थे और पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार की गई।
हाई कोर्ट का फैसला: बरी होना बहाली का आधार नहीं
सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ में हुई। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे की प्रकृति अलग होती है।
कोर्ट ने कहा कि केवल आपराधिक मामले में बरी हो जाना विभागीय कार्रवाई को स्वतः समाप्त नहीं करता। साथ ही यह भी कहा गया कि न्यायालय विभागीय जांच के तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता, बल्कि केवल प्रक्रिया की वैधता की जांच करता है।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, अब अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को
हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए दोनों पूर्व आरक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की है। सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के लिए 13 जुलाई 2026 की तारीख निर्धारित की है।
टाइमलाइन: पूरे मामले का घटनाक्रम
- 30 जनवरी 2006: आरोपी को पेशी के दौरान फरार होने का मौका मिला
- 23 दिसंबर 2006: दोनों आरक्षक सेवा से बर्खास्त
- 16 मई 2007: विभागीय अपील खारिज
- 30 जुलाई 2015: आपराधिक मामले में बरी
- 20 फरवरी 2025: हाई कोर्ट ने बहाली याचिका खारिज
- 13 जुलाई 2026: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तय





















