नई दिल्ली। राजधानी में आतंकी हमलों में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को मुआवजा और सरकारी नौकरी में विशेष लाभ देने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह मामला नीतिगत निर्णयों से जुड़ा है, जिसे तय करना सरकार का अधिकार क्षेत्र है।

हाई कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी नीति बनाना अदालत का काम नहीं

मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि इस तरह के विषय नीति निर्माण से जुड़े होते हैं। अदालत ने माना कि सरकार के स्तर पर यह तय किया जाना चाहिए कि पीड़ित परिवारों को क्या लाभ दिया जाए और किस तरह की व्यवस्था लागू हो।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का काम नीति बनाना नहीं, बल्कि पहले से मौजूद कानूनों को लागू कराना है।

याचिका में क्या थी मांग आतंकी पीड़ितों के लिए विशेष नीति की अपील

यह याचिका साउथ एशियन फोरम फॉर पीपल अगेंस्ट टेरर नामक संगठन की ओर से दायर की गई थी। इसमें मांग की गई थी कि आतंकी हमलों में मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवजा दिया जाए और सरकारी नौकरियों में विशेष छूट और प्राथमिकता दी जाए।साथ ही याचिका में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से यह भी आग्रह किया गया था कि इस विषय पर एक स्पष्ट और समान नीति तैयार की जाए ताकि सभी पीड़ित परिवारों को एक समान सहायता मिल सके।

हाल की घटनाओं का हवाला रेड फोर्ट हमले जैसी घटनाओं का जिक्र

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने हाल के आतंकी हमलों का हवाला दिया, जिनमें रेड फोर्ट जैसी घटनाएं शामिल थीं। उनका कहना था कि ऐसे मामलों को देखते हुए एक स्पष्ट नीति बनाना बेहद जरूरी है, ताकि पीड़ित परिवारों को समय पर और उचित सहायता मिल सके।वकील ने यह भी बताया कि गोवा सरकार पहले से इस तरह की नीति लागू कर चुकी है, जिसे एक मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है।

अदालत का रुख सरकार के समक्ष रखें अपनी मांग

दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले के मेरिट पर कोई टिप्पणी किए बिना याचिका को बंद कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वे अपनी मांगों को सीधे केंद्र और दिल्ली सरकार के समक्ष प्रस्तुत करें।कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित विभाग इस प्रतिनिधित्व पर कानून के अनुसार जल्द निर्णय ले, लेकिन अदालत स्वयं किसी नई नीति को लागू करने का आदेश नहीं दे सकती।

निष्कर्ष आतंकी पीड़ितों की मदद पर नीति की जिम्मेदारी सरकार के पास

इस फैसले के साथ एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया कि संवेदनशील मामलों में राहत और नीति निर्माण का अधिकार सरकार के पास होता है। अदालत ने साफ संदेश दिया कि ऐसे मुद्दों पर न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रहेगा और समाधान सरकार के स्तर पर ही तय किया जाना चाहिए।

Leave a reply

Please enter your name here
Please enter your comment!