अभिषेक कुमार सोनी ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंप एसडीएम करुण कुमार डहरिया के कार्यकाल की समीक्षा और अवैध बॉक्साइट खनन पर रोक की उठाई थी मांग

अवकाश के दिन कुसमी एसडीएम कार्यालय में ग्रामीणों से लिए गए कथन पर भी उठ रहे सवाल

(अभीषेक सोनी) बलरामपुर/कुसमी। हंसपुर हत्याकांड और कुसमी में पूर्व एसडीएम करुण कुमार डहरिया के कार्यकाल से जुड़े मामलों को लेकर उठी शिकायत अब प्रशासनिक प्रक्रिया और जांच की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रही है। ऑल मीडिया प्रेस एसोसिएशन के सरगुजा संभाग अध्यक्ष अभिषेक कुमार सोनी द्वारा मुख्यमंत्री को सौंपे गए ज्ञापन पर संज्ञान लेते हुए कलेक्टर बलरामपुर को कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, जिसके बाद प्रकरण एसडीएम चेतन साहू को जांच हेतु सौंपा गया। जांच रिपोर्ट जनदर्शन पोर्टल में दर्ज आधिकारिक टिप्पणी में एक ओर जहां हंसपुर मामले को आपराधिक प्रकृति का बताते हुए अग्रेतर कार्रवाई से इंकार किया गया है, वहीं दूसरी ओर पूर्व एसडीएम के कार्यकाल से जुड़े निर्णयों की निष्पक्षता के लिए “अन्य कार्यालय से जांच करना उचित” बताया गया है। इसके विपरीत जमीनी स्तर पर कुसमी कार्यालय में कथित रूप से अवकाश के दिन बंद कमरे में ग्रामीणों के कथन लेने जैसी कार्रवाई सामने आने से न केवल जनदर्शन टिप्पणी और वास्तविक प्रक्रिया में स्पष्ट विरोधाभास उजागर हुआ है, बल्कि जांच की निष्पक्षता, पारदर्शिता और शासन के निर्देशों के पालन को लेकर भी गंभीर संदेह गहरा गया है।



ज्ञापन में उठी थी उच्च स्तरीय जांच और कार्यकाल के समीक्षा की मांग

ऑल मीडिया प्रेस एसोसिएशन के सरगुजा संभाग अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ श्रमजीवी पत्रकार कल्याण संघ राजपुर के प्रवक्ता एवं संचार टुडे सीजीएमपी न्यूज के स्टेट हेड अभिषेक कुमार सोनी ने मुख्यमंत्री को विस्तृत ज्ञापन प्रस्तुत कर कुसमी में तत्कालीन एसडीएम करुण कुमार डहरिया के कार्यकाल के दौरान हुए प्रशासनिक निर्णयों, संभावित अनियमितताओं तथा अवैध बॉक्साइट खनन एवं रेत परिवहन से कथित सांठगांठ की उच्च स्तरीय जांच की मांग की थी। साथ ही जिले में अवैध बॉक्साइट खनन और परिवहन पर तत्काल रोक लगाने की भी मांग की गई थी।ज्ञापन पर संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री निवास, छत्तीसगढ़ शासन से कलेक्टर बलरामपुर को आवेदन पर आवश्यक कार्यवाही कर उसकी जानकारी जनदर्शन पोर्टल पर दर्ज करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद कलेक्टर द्वारा शिकायत को जांच हेतु एसडीएम चेतन साहू को प्रेषित किया गया था।

जनदर्शन पोर्टल में आपराधिक प्रकरण बताकर ‘अग्रेतर कार्यवाही की आवश्यकता नहीं' बताई गई

जनदर्शन पोर्टल में दर्ज विवरण में उल्लेख किया गया है कि मामला आपराधिक प्रकृति का है तथा इसकी विवेचना पुलिस द्वारा की जा रही है। दस्तावेज़ के अनुसार थाना कोरंधा में एफआईआर क्रमांक 03/2026 दिनांक 16.02.2026 दर्ज कर प्रकरण में आरोपियों को न्यायिक रिमांड पर भेजा गया है और विवेचना जारी है। इस आधार पर आवेदन में अग्रेतर कार्यवाही की आवश्यकता नहीं बताई गई है।एक ओर जनदर्शन पोर्टल पर दर्ज आधिकारिक टिप्पणी में यह स्पष्ट उल्लेख किया गया कि “तत्कालीन एसडीएम कुसमी द्वारा अपने कार्यकाल में किये गये आदेश, अनुमति एवं कार्यवाही की जांच पारदर्शिता एवं निष्पक्षता की दृष्टिकोण से इस कार्यालय से अन्य कार्यालय द्वारा किया जाना उचित होगा।”

जमीनी स्तर पर उलट कार्रवाई, कुसमी एसडीएम कार्यालय में अवकाश के दिन लिए गए कथन

इधर, स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारी के अनुसार इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हो रही कार्रवाई इन टिप्पणियों के विपरीत नजर आ रही है। जानकारी के अनुसार जांच की प्रक्रिया उसी राजस्व विभाग द्वारा और उसी कुसमी एसडीएम कार्यालय में कराई जा रही है। इतना ही नहीं, यह पूरी कार्रवाई शनिवार दिनांक 12/04/2026 को शासकीय अवकाश के दिन संपन्न कराई गई, जिससे पूरे मामले को लेकर संदेह और गहरा गया है। ग्रामीणों को कुसमी तहसीलदार द्वारा नोटिस देकर कथन दर्ज कराने के लिए बुलाया गया, लेकिन नोटिस में स्थान का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया, जिससे लोगों में भ्रम की स्थिति बनी रही। बाद में उन्हें एसडीएम कार्यालय पहुंचने को कहा गया, जहां दिनभर बयान दर्ज किए गए।

ग्रामीणों के अनुसार बयान दर्ज करने की प्रक्रिया के दौरान और अंदर बंद कमरे में बयान लिए गए। इसी बीच एक और विवाद सामने आया, जब एक शिक्षक मनीष सिन्हा बिना किसी रोक-टोक के कार्यालय के भीतर प्रवेश करते देखे गए और करीब 20 मिनट तक अंदर मौजूद रहे। बताया जा रहा है कि उक्त शिक्षक को पूर्व में शिकायत के बाद कार्यालय से हटाया जा चुका था। अधिकारियों के बाहर निकलने के कुछ समय बाद उनका बाहर आना पूरे घटनाक्रम को और संदिग्ध बनाता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि जिस मामले में स्वयं राजस्व विभाग के अधिकारियों की भूमिका सवालों के घेरे में रही है, उसी विभाग द्वारा और उसी कार्यालय में जांच कराना निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। वहीं नोटिस जारी करने और उसकी तामिली के बीच अत्यंत कम समय दिया जाना भी लोगों पर दबाव बनाने जैसा प्रतीत हो रहा है। पहले से ही संवेदनशील इस मामले में निलंबित पूर्व एसडीएम करुण डहरिया से जुड़े आरोपों के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है, ऐसे में जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव लोगों के बीच अविश्वास को बढ़ा रहा है।पूरे घटनाक्रम के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं जिनके जब आधिकारिक टिप्पणी में अन्य कार्यालय से जांच को उचित बताया गया, तो उसी कार्यालय में जांच क्यों कराई गई?स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि जब आधिकारिक टिप्पणी में अन्य कार्यालय से जांच को उचित बताया गया है, तो उसी कार्यालय में प्रक्रिया संचालित किए जाने के कारणों को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। साथ ही अवकाश के दिन कार्रवाई, सीमित उपस्थिति में बयान और मीडिया की अनुपस्थिति जैसे पहलुओं को लेकर भी पारदर्शिता की मांग उठ रही है। बाहरी व्यक्ति को अंदर प्रवेश देने का आधार भी स्पष्ट नहीं हो पाया है।

मांग थी व्यापक प्रशासनिक जांच और समीक्षा की, अग्रेत्तर कार्रवाई की आवश्यकता नहीं बोलकर कर दी फाइल बंद, जांच के दायरे और मंशा पर उठे प्रश्न

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री को सौंपे गए दोनों विस्तृत ज्ञापनों में केवल हंसपुर की घटना की आपराधिक जांच ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े व्यापक प्रशासनिक पहलुओं की भी स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्च स्तरीय समीक्षा की मांग की गई थी। ज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि कुसमी क्षेत्र में तत्कालीन एसडीएम के कार्यकाल के दौरान लिए गए प्रशासनिक निर्णयों, पारित आदेशों, दी गई अनुमतियों तथा की गई कार्यवाहियों की समग्र जांच कराई जाए। साथ ही अवैध बॉक्साइट खनन और रेत परिवहन से जुड़े संभावित सांठगांठ, विभागीय स्तर पर हुई कथित अनियमितताओं, राजस्व, खनिज, वन एवं पुलिस विभाग की भूमिका, प्राप्त शिकायतों एवं की गई कार्रवाई की वस्तुनिष्ठ पड़ताल की भी मांग रखी गई थी। इतना ही नहीं, ज्ञापन में यह भी आग्रह किया गया था कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही, संरक्षण, पद के दुरुपयोग या भ्रष्टाचार के तथ्य सामने आते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक एवं दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

इन सभी बिंदुओं से यह स्पष्ट होता है कि मांग केवल आपराधिक प्रकरण तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही तय करने और पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली की समीक्षा से जुड़ी थी। इसके बावजूद जनदर्शन पोर्टल में प्रकरण को आपराधिक प्रकृति का बताते हुए “अग्रेतर कार्यवाही की आवश्यकता नहीं” दर्ज किया जाना स्वाभाविक रूप से कई गंभीर सवाल खड़े करता है क्या प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा के मूल मुद्दे को दरकिनार कर दिया गया, या फिर जांच के दायरे को केवल आपराधिक विवेचना तक सीमित कर दिया गया? साथ ही, जब उसी आधिकारिक टिप्पणी में “अन्य कार्यालय से जांच उचित” होने की बात भी दर्ज है, तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या उस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई हुई या नहीं। यह पूरा विरोधाभास अब जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता, दायरे और मंशा—तीनों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।


इधर आवेदक ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सीधे मुख्यमंत्री से मुलाकात कर सभी संबंधित दस्तावेजों के साथ मुख्यमंत्री के समक्ष ज्ञापन प्रस्तुत कर घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति से अवगत कराने का निर्णय लिया है ताकि निष्पक्ष  एवं उच्च स्तरीय कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इन सवालों का क्या जवाब देता है और क्या इस मामले में उच्च स्तर पर कोई ठोस कदम उठाया जाता है, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह सवालों के घेरे में ही बना रहता है।

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