

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में बिना ठोस साक्ष्य के जारी किए गए नजरबंदी आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अंदाजे या सामान्य आरोपों के आधार पर किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त नहीं किया जा सकता।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता चूड़ामणि साहू, निवासी बाराद्वार जिला सक्ती, पेशे से ऑटो चालक है। उसे वर्ष 2020 में एनडीपीएस एक्ट के तहत सक्ती पुलिस ने गिरफ्तार किया था। 2021 में उसे सजा सुनाई गई, जिसके बाद उसने हाई कोर्ट में अपील दायर की और वर्ष 2022 में उसे जमानत मिल गई।
जमानत के बाद वह ऑटो चलाकर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा था।
नजरबंदी आदेश कैसे जारी हुआ
साल 2024 में पुलिस और प्रशासन ने उसे आदतन अपराधी बताते हुए पीआईटी एनडीपीएस एक्ट के तहत तीन महीने के लिए जिला जेल सक्ती में नजरबंद करने का आदेश जारी कर दिया। इसी आदेश को याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट की टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल पुरानी एफआईआर या सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी घोषित कर उसकी स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि नजरबंदी जैसे गंभीर आदेश के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।

































