MP High Court: ‘कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी एक तिहाई से ज्यादा संपत्ति की वसीयत घोषित नहीं कर सकता है. जब तक संपत्ति के सभी वारिस इसकी परमिशन ना दे देें. ना ही बेटे के मां के साथ रहने से उसका पिता की संपत्ति से हक खत्म हो जाता है.’

यह आदेश मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून की व्याख्या करते हुए एक मामले में सुनाया है.

पिता की संपत्ति को लेकर दो भाइयों में हुआ था विवाद

पूरा मामला ग्वालियर के वार्ड नंबर 53 का है. यहां पिता की संपत्ति को लेकर दो भाइयों में विवाद हो गया था. दरअसल वार्ड नंबर 53 में स्थित जमीन को एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपने एक बेटे के नाम वसीयत कर दिया था. जिसको लेकर दूसरा बेटा कोर्ट चला गया. जहां पहले भाई ने तर्क दिया कि माता-पिता के तलाक के बाद दूसरा भाई मां के साथ रह रहा था. इसलिए पिता ने दूसरे भाई को संपत्ति का हिस्सा नहीं दिया है. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने शत प्रतिशत संपत्ति को एक भाई को देने वाली वसीयत को खारिज कर दिया और संपत्ति को 50-50 प्रतिशत बांटने का फैसला सुनाया.

ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा

वहीं पहले भाई ने ट्रायल कोर्ट के साल 2007 में दिए गए फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. सुनवाई के बाद हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी पूरी संपत्ति का 33.33 प्रतिशत से ज्यादा की वसीयत नहीं कर सकता है. पूरी संपत्ति की वसीयत करने के लिए सभी वैध वारिसों की सहमति लेना जरूरी है. संपत्ति के किसी भी वारिस की चुप्पी को उसकी रजामंदी नहीं माना जा सकता है. इसके साथ ही हाई कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें यह बताया गया हो कि माता-पिता के तलाक के के बाद मां के साथ रहने पर बेटे का पिता की संपत्ति पर हक समाप्त हो जाता है.

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