बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने धनशोधन मामले में प्रवर्तन निदेशालय यानी ED द्वारा कुर्क की गई छह अचल संपत्तियों को 4.36 करोड़ रुपये की सावधि जमा के बदले मुक्त करने की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल कुर्क संपत्ति के बराबर रकम की FD देने की पेशकश से संबंधित व्यक्ति को संपत्ति छुड़ाने का स्वत: कानूनी अधिकार हासिल नहीं हो जाता।मामला रायपुर निवासी हृषभ सोनी और उनकी पत्नी कोमल सोनी की याचिका से जुड़ा था। ED ने दोनों की छह अचल संपत्तियों को 9 दिसंबर 2024 के अस्थायी कुर्की आदेश के तहत संलग्न किया था। याचिकाकर्ताओं ने इन संपत्तियों के बदले 4,36,05,780 रुपये की सावधि जमा देने की पेशकश की थी।

कारोबार प्रभावित होने का दिया था तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि संपत्तियों के लंबे समय तक कुर्क रहने से उनके कारोबार और वित्तीय गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उनका तर्क था कि यदि संपत्तियों के बराबर मूल्य की FD जमा करा दी जाए तो ED का हित भी सुरक्षित रहेगा और कुर्की हटाई जा सकती है।हालांकि धनशोधन निवारण कानून से संबंधित न्यायाधिकरण ने अप्रैल 2026 में उनकी मांग स्वीकार नहीं की थी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

नियम में प्रावधान है, लेकिन यह अधिकार नहीं

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने धनशोधन निवारण अधिनियम और 2013 के संबंधित नियमों की व्याख्या की। अदालत ने पाया कि नियम 5(5) में संयुक्त स्वामित्व वाली अचल संपत्ति से जुड़ी कुछ परिस्थितियों में संबंधित व्यक्ति के हिस्से के मूल्य के बराबर FD स्वीकार करने का प्रावधान मौजूद है।लेकिन अदालत ने साफ किया कि इस प्रावधान को हर प्रकार की कुर्क अचल संपत्ति को FD के बदले मुक्त कराने के सामान्य अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता।अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि नियम में सावधि जमा स्वीकार करने के लिए 'स्वीकार कर सकता है' जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इसका अर्थ है कि संबंधित प्राधिकारी के पास विवेकाधिकार है और FD स्वीकार करना उसके लिए अनिवार्य नहीं है।

हाईकोर्ट में याचिका क्यों नहीं मिली राहत

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैधानिक या लागू करने योग्य अधिकार स्थापित नहीं कर सके, जिसके आधार पर 4.36 करोड़ रुपये की FD के बदले सभी छह संपत्तियों को मुक्त करना अनिवार्य हो।अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि इन संपत्तियों की कुर्की की वैधता से संबंधित मूल विवाद पहले से ही धनशोधन निवारण अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष लंबित है। ऐसे में हाईकोर्ट ने इस स्तर पर कुर्की की वैधता या संपत्तियों के कथित अपराध से संबंध जैसे तथ्यात्मक विवादों में जाने से इनकार किया।

अनुच्छेद 226 पर भी अदालत ने दिया अहम संकेत

फैसले में हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत भी दोहराया कि जब किसी विशेष कानून में शिकायत के समाधान के लिए प्रभावी वैधानिक व्यवस्था मौजूद हो, तब सामान्य तौर पर हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।धनशोधन निवारण अधिनियम की धारा 42 के तहत अपीलीय न्यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील का वैधानिक रास्ता उपलब्ध है। अदालत को इस मामले में ऐसा कोई असाधारण आधार नहीं मिला, जिसके कारण सामान्य वैधानिक प्रक्रिया को छोड़कर रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाए।

31 अगस्त को आया फैसला

न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने 31 अगस्त 2026 को मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता केवल बराबर राशि की सावधि जमा देने की पेशकश के आधार पर कुर्क संपत्तियों को मुक्त कराने का अपना कानूनी अधिकार साबित नहीं कर पाए।हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि अदालत ने लागत के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया।

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