लुधियाना : कस्टम विभाग द्वारा जारी किए गए करीब 2000 करोड़ रुपये के कारण बताओ नोटिसों (शो कॉज नोटिस) को लेकर चल रहा विवाद अब लगभग खत्म हो गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इन नोटिसों को पूरी तरह वैध ठहराते हुए कंपनियों को किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि संबंधित कंपनियां अब विभाग की एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के समक्ष पेश होकर ही अपना पक्ष रखें।

पूरा मामला ए.एस.ई.ए.एन – इंडिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (ए.आई.एफ.टी.ए.) के तहत मिलने वाली आयात शुल्क छूट के दुरुपयोग से जुड़ा है। इस समझौते के अंतर्गत वियतनाम जैसे देशों से आयातित कॉपर पाइप और ट्यूब पर भारी ड्यूटी छूट मिलती है। जांच में सामने आया कि कई आयातक कंपनियां चीन और हॉन्गकॉन्ग से आने वाले माल को कागजों में वियतनाम का बताकर भारत ला रही थीं, जिससे करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी की जा रही थी।

कार्रवाई से बचने के लिए कंपनियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि उनके मुख्य कार्यालय दिल्ली में स्थित हैं तथा यह मामला केंद्र सरकार के अंतरराष्ट्रीय समझौते से जुड़ा है, इसलिए स्थानीय कस्टम विभाग कार्रवाई नहीं कर सकता। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कस्टम विभाग की कार्रवाई और जांच को पूरी तरह उचित ठहराया।

जांच के दौरान कई अहम तथ्य सामने आए हैं। अधिकारियों के अनुसार वियतनाम में कॉपर का उत्पादन सीमित है, लेकिन वहां से भारत में आयात असामान्य रूप से बढ़ गया। इसके अलावा, दस्तावेजों में सप्लायर वियतनाम की कंपनियां दिखाई गईं, जबकि भुगतान चीन के बैंक खातों में किया गया, जिससे पूरे नेटवर्क पर संदेह और गहरा गया।

केंद्र सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि भले ही आयातकों के पास सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन (सी ओ ओ) हो, यदि माल के वास्तविक स्रोत पर संदेह है तो कस्टम विभाग को ड्यूटी छूट रोकने और विस्तृत जांच करने का पूरा अधिकार है।

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब उन कंपनियों पर शिकंजा कसना तय माना जा रहा है, जो फर्जी घोषणाओं के जरिए ड्यूटी में छूट ले रही थीं। अदालत ने साफ कर दिया है कि कंपनियां सीधे कोर्ट में राहत मांगने के बजाय विभागीय प्रक्रिया का पालन करें। अब संबंधित कंपनियों को एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के समक्ष साक्ष्यों सहित अपना पक्ष रखना होगा।

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