

अभिषेक कुमार सोनी ✍️
रायपुर/सरगुजा/बलरामपुर। छत्तीसगढ़ में निवासरत कुछ जनजातियों को उनकी अत्यंत कमजोर सामाजिक-आर्थिक स्थिति और घटती जनसंख्या के आधार पर विशेष संरक्षित जनजाति (PVTG) की श्रेणी में रखा गया है। राज्य में अबूझमाड़िया, बैगा, कमार, बिरहोर और पहाड़ी कोरवा इस श्रेणी में शामिल हैं।इन जनजातियों की पहचान कुछ निश्चित मानकों के आधार पर की जाती है। इनमें साक्षरता दर का कम होना, जनसंख्या का घटते या स्थिर रहना, पारंपरिक जीवन पद्धति तथा आजीविका के लिए जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता प्रमुख है। ये समुदाय मुख्यतः बस्तर, सरगुजा और आसपास के वन एवं पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करते हैं।
इतिहास से जुड़ी जड़ें
इन जनजातियों का इतिहास सदियों पुराना है और इनका जीवन हमेशा से प्रकृति और जंगलों के साथ गहराई से जुड़ा रहा है। अबूझमाड़िया जैसे समुदाय लंबे समय तक बाहरी दुनिया से लगभग कटे रहे, जबकि बैगा जनजाति पारंपरिक “बेवर” (झूम) खेती के लिए जानी जाती रही है। बिरहोर जैसे समुदाय घुमंतू जीवन जीते थे और जंगलों से संसाधन जुटाकर अपना जीवन यापन करते थेऔपनिवेशिक काल, विशेषकर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन भारत के दौरान जंगलों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ने से इन जनजातियों के पारंपरिक अधिकार और जीवनशैली प्रभावित हुई। स्वतंत्रता के बाद भी वन कानूनों, विकास परियोजनाओं और विस्थापन ने इनके सामाजिक ढांचे पर असर डाला। धीरे-धीरे ये समुदाय मुख्यधारा से जुड़े, लेकिन कई क्षेत्रों में आज भी उनकी पारंपरिक पहचान और अलगाव बरकरार है।

वर्तमान चुनौतियां
विशेषज्ञों के अनुसार, इन जनजातियों के सामने कुपोषण, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और आर्थिक संसाधनों का अभाव जैसी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। कई क्षेत्रों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं, जिसके चलते सामान्य बीमारियां भी गंभीर रूप ले लेती हैं। वहीं शिक्षा के अभाव के कारण नई पीढ़ी का मुख्यधारा से जुड़ना कठिन हो जाता है।भौगोलिक दृष्टि से ये क्षेत्र बेहद दुर्गम हैं, जिसके कारण सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सीमित रहती है। इन समुदायों का जीवन आज भी पारंपरिक व्यवस्था पर आधारित है और दैनिक आवश्यकताओं के लिए वन संसाधनों पर निर्भरता बनी हुई है।
विकास और संरक्षण के प्रयास
इन जनजातियों के संरक्षण और विकास के लिए राज्य और केंद्र स्तर पर विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Groups) के तहत आवास, पोषण, स्वास्थ्य जांच, शिक्षा और आजीविका से जुड़े कार्यक्रम चलाए जाते हैं। साथ ही वनाधिकार कानूनों के माध्यम से भूमि अधिकार दिलाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों में योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण पर लगातार काम किया जा रहा है, ताकि इन जनजातियों का समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके।

जमीनी हकीकत और सवाल
हालांकि, योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में योजनाओं का लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई जगहों पर स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण सेवाओं की पहुंच अभी भी सीमित है।विशेषज्ञों का मानना है कि इन जनजातियों के वास्तविक विकास के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी जमीनी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि विकास की प्रक्रिया में इनकी पारंपरिक संस्कृति, भाषा और जीवनशैली को संरक्षित रखा जाए।

































