

नई दिल्ली: “गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए एक दिल-एक प्राण होकर कटिबद्ध हो जाइए… हिंदुस्तान आज़ाद होगा।” नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ये शब्द मात्र भाषण नहीं थे, बल्कि वह संकल्प थे, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में नेताजी का योगदान साहस, बलिदान और अदम्य इच्छाशक्ति का अनुपम उदाहरण है।
23 जनवरी 1897 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के कटक में जन्मे सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस को आज पूरा देश ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाता है। उनका जीवन राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक रहा। नेताजी न केवल अपने समय के, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भी प्रेरणास्रोत हैं।
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उनके तेवर बचपन से ही स्पष्ट थे। मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी माता से प्रश्न किया था कि स्वार्थ के इस युग में कितने लोग मातृभूमि के लिए निजी हितों का त्याग कर सकते हैं। यही विचार आगे चलकर उनके जीवन का पथ बन गया।
वर्ष 1921 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा जैसी प्रतिष्ठित नौकरी से इस्तीफा देकर स्वतंत्रता संग्राम को अपना पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अपने भाई शरत चंद्र बोस को लिखे पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया था कि राष्ट्र निर्माण केवल त्याग और कष्ट की भूमि पर ही संभव है।
नेताजी आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत दृढ़ थे। वे अपने साथ सदैव भगवद्गीता रखते थे और उपनिषदों के ‘त्याग’ के सिद्धांत को जीवन में उतारते हुए राष्ट्र और उसके श्रमिक वर्ग के लिए निरंतर संघर्षरत रहे।
21 अक्टूबर 1943 भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है, जब सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद सरकार’ की स्थापना की। इसके साथ ही वे स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार के पहले राष्ट्राध्यक्ष बने। इस सरकार को जापान, जर्मनी, इटली, चीन सहित दस से अधिक देशों की मान्यता मिली, जिससे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हुआ।
नेताजी के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश सेना को कई मोर्चों पर कड़ी चुनौती दी और भारत के कुछ क्षेत्रों को आज़ाद भी कराया। 26 अगस्त 1943 को आईएनए की कमान संभालते हुए नेताजी ने कहा था कि वे हर परिस्थिति में भारतीयों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहेंगे।
आजाद हिंद फौज के सैनिकों की वीरता और बलिदान ने देश में नई चेतना का संचार किया। लाल किला ट्रायल ने पूरे भारत में राष्ट्रभक्ति की लहर दौड़ा दी और ब्रिटिश शासन की जड़ों को कमजोर कर दिया।
यह दिवस नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के उन वीर सेनानियों को नमन करने का अवसर है, जिनके अदम्य साहस और बलिदान ने भारत को स्वतंत्रता के मार्ग पर अग्रसर किया।






















