छत्तीसगढ़ : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा संसद में 30 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त घोषित करने के बाद अब पुराने अभियानों और फैसलों पर नई बहस शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि यदि पहले शुरू हुए आक्रामक ऑपरेशन बिना बाधा जारी रहते, तो यह उपलब्धि 2019 के आसपास ही हासिल की जा सकती थी।

कौन हैं एसआरपी कल्लूरी, जिनका नाम फिर चर्चा में

इस पूरे संदर्भ में शिवराम प्रसाद कल्लूरी का नाम प्रमुखता से सामने आता है। 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी कल्लूरी को नक्सल ऑपरेशन का अनुभवी चेहरा माना जाता है। उन्होंने कोरबा, बिलासपुर, बलरामपुर और दंतेवाड़ा जैसे संवेदनशील जिलों में पुलिस अधीक्षक के रूप में काम किया और बाद में बस्तर रेंज के आईजी भी रहे।

बलरामपुर मॉडल: जहां खत्म हुआ नक्सल प्रभाव

बलरामपुर-रामानुजगंज में तैनाती के दौरान कल्लूरी ने 2004 से आक्रामक रणनीति अपनाई। लगातार ऑपरेशन और स्थानीय सहयोग के चलते एक दशक के भीतर क्षेत्र से नक्सल प्रभाव लगभग समाप्त हो गया। वर्ष 2014 तक यह इलाका नक्सल मुक्त स्थिति के करीब पहुंच गया था।

बस्तर में तेज हुआ अभियान, फिर बदला माहौल

2014 में बस्तर में आईजी बनने के बाद कल्लूरी ने उसी रणनीति को आगे बढ़ाया। सुरक्षा बलों, एसटीएफ और स्थानीय पुलिस की संयुक्त कार्रवाई से नक्सलियों पर लगातार दबाव बना। इस दौरान बड़ी संख्या में नक्सलियों ने सरेंडर किया और कई मुठभेड़ में मारे गए।

लेकिन हर ऑपरेशन के बाद फर्जी मुठभेड़ के आरोप लगने लगे। ताड़मेटला जैसी घटनाओं ने माहौल को और संवेदनशील बना दिया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठे, जिससे अभियान की गति प्रभावित हुई।

राजनीतिक दबाव और रणनीति पर असर

नक्सल विरोधी कार्रवाई पर राजनीति भी तेज हो गई। मीडिया, सामाजिक संगठनों और कुछ समूहों द्वारा उठाए गए सवालों के कारण सरकार पर दबाव बढ़ा। उस समय केंद्र में वर्तमान जैसी सख्त नीति नहीं थी, जिसके चलते अंततः राज्य सरकार को पीछे हटना पड़ा और कल्लूरी को बस्तर से हटा दिया गया।

विश्लेषकों का मानना है कि अगर उस दौर में भी वैसी ही मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति होती, जैसी आज दिखाई दे रही है, तो परिणाम और जल्दी सामने आ सकते थे।

रेड कॉरिडोर की योजना कैसे टूटी

सरगुजा संभाग में नक्सलियों की सबसे बड़ी रणनीति आंध्रप्रदेश से नेपाल तक रेड कॉरिडोर बनाने की थी। लेकिन स्थानीय पुलिस और जनता के सहयोग से इस नेटवर्क को तोड़ दिया गया।

1990 के दशक में झारखंड से फैलती नक्सली गतिविधियों को सरगुजा में ही रोक दिया गया, जिससे उनकी लंबी रणनीति विफल हो गई।

आंकड़े बताते हैं अभियान की तीव्रता

कल्लूरी के कार्यकाल के दौरान

  • करीब 1200 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया
  • 40 से ज्यादा मुठभेड़ में नक्सली मारे गए
  • कई शीर्ष कमांडरों का सफाया हुआ

उनकी इसी भूमिका के लिए उन्हें दो बार वीरता पदक से सम्मानित किया गया।

वर्तमान परिदृश्य और आगे की दिशा

आज जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नक्सलवाद के खात्मे का दावा किया जा रहा है, तब यह भी स्पष्ट हो रहा है कि यह सफलता कई वर्षों की रणनीति, संघर्ष और लगातार अभियानों का परिणाम है।

बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में अब विकास, आधारभूत संरचना और विश्वास बहाली पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि कुछ सीमित इलाकों में नक्सली गतिविधियां अब भी नजर आती हैं, लेकिन उनकी ताकत पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुकी है।

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