बिलासपुर : में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक अहम मामला सामने आया है, जहां शिक्षा के अधिकार कानून के पालन में अनियमितताओं को लेकर जनहित याचिका दायर की गई है। भिलाई निवासी सीवी भगवंत राव ने अधिवक्ता देवर्षि ठाकुर के माध्यम से हाईकोर्ट में यह याचिका लगाई।

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को नोटिस जारी किया है और शपथ पत्र के साथ विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

डीपीआई ने जिलों से मांगी तत्काल जानकारी

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आ गया है। लोक शिक्षण संचालनालय ने प्रदेशभर के जिला शिक्षा अधिकारियों को पत्र जारी कर प्राइवेट स्कूलों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी मांगी है। इसके लिए 2 अप्रैल 2026 की समय सीमा तय की गई है।

डीईओ को सभी सूचनाएं क्रमवार तरीके से सॉफ्ट और हार्ड कॉपी में उपलब्ध करानी होंगी।

बिना भवन के चल रहे स्कूलों पर उठे सवाल

याचिका में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि राज्य में कई निजी स्कूल बिना अपने भवन के संचालित हो रहे हैं। ये स्कूल लीज पर भवन लेकर चलाए जा रहे हैं और मान्यता प्रक्रिया में गड़बड़ी कर रहे हैं।

अदालत ने इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए सभी प्राइवेट स्कूलों की पूरी जानकारी तलब की है, जिससे मान्यता प्रक्रिया में हो रही गड़बड़ियों का खुलासा हो सके।

मान्यता के नियमों पर भी नजर

नियमों के अनुसार किसी भी स्कूल को मान्यता देने के लिए उसका स्वयं का भवन होना जरूरी है। इसके अलावा छात्र संख्या के अनुरूप कक्षाएं, बिजली, पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं अनिवार्य होती हैं।

लेकिन आरोप है कि कई मामलों में इन शर्तों को नजरअंदाज कर किरायानामा के आधार पर ही मान्यता दी जा रही है, जिससे बिना मानकों के स्कूलों का संचालन बढ़ता जा रहा है।

क्या जानकारी देनी होगी अधिकारियों को

डीपीआई ने जिला शिक्षा अधिकारियों से जिन बिंदुओं पर जानकारी मांगी है, उनमें शामिल हैं

  • ऐसे निजी स्कूलों की सूची जिन्हें बिना भवन के मान्यता दी गई
  • स्कूल में दर्ज छात्रों की संख्या और स्तर
  • स्कूल का वर्गीकरण, जैसे प्राथमिक, माध्यमिक, हाई या हायर सेकेंडरी
  • मान्यता कब और किस आधार पर दी गई

खुल सकता है बड़ा फर्जीवाड़ा

हाईकोर्ट में पेश की जाने वाली रिपोर्ट के बाद शिक्षा विभाग और निजी स्कूल प्रबंधन के बीच चल रही कथित अनियमितताओं पर बड़ा खुलासा हो सकता है। यह कार्रवाई राज्य में शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और गुणवत्ता को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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