

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्यपाल द्वारा दया याचिका खारिज किए जाने के बाद उसके पुनर्विचार का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे नीरज माली उर्फ गोलू की याचिका खारिज कर दी।
हत्या के मामले में काट रहा है उम्रकैद की सजा
मामला बिलासपुर जिला न्यायालय परिसर के सामने हुई हत्या की घटना से जुड़ा है। इस मामले में नीरज माली उर्फ गोलू को दोषी ठहराते हुए अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। सजा मिलने के बाद उसने राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर कर राहत की मांग की थी, लेकिन राज्यपाल ने याचिका अस्वीकार कर दी।
हाईकोर्ट में दायर की थी पुनर्विचार याचिका
राज्यपाल के फैसले के बाद नीरज माली ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करते हुए दया याचिका पर दोबारा विचार करने की मांग की। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि राज्यपाल के अंतिम निर्णय के बाद पुनर्विचार की कोई कानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।
डिवीजन बेंच ने याचिका की खारिज
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि राज्यपाल द्वारा दया याचिका पर अंतिम निर्णय दिए जाने के बाद उसी विषय पर पुनर्विचार की मांग कानून के तहत स्वीकार नहीं की जा सकती। इस आधार पर याचिकाकर्ता की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई।
क्षमादान प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से अहम माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया कि दया याचिका पर राज्यपाल के अंतिम निर्णय के बाद उसी मामले में पुनर्विचार का कोई वैधानिक अधिकार उपलब्ध नहीं है।











