


सुकमा : जिले की दुर्गम वादियों में करीब 650 मीटर की ऊंचाई पर बसे गोगुंडा गांव में आखिरकार बिजली पहुंच गई है। आजादी के 78 वर्षों बाद पहली बार यहां बल्ब जले, जिससे पूरा गांव उम्मीद और उत्साह से जगमगा उठा।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में यह पहल संभव हो सकी। यह उपलब्धि केवल तकनीकी विकास नहीं, बल्कि चार दशकों से नक्सल प्रभाव के साये में जी रहे ग्रामीणों के लिए नई शुरुआत है।
अंधेरे से उजाले तक का सफर
गोगुंडा गांव लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों के कारण विकास से कट गया था। सूरज ढलते ही गांव सन्नाटे में डूब जाता था। ग्रामीण ढिबरी और टॉर्च के सहारे जीवन यापन करते थे। अब बच्चों की पढ़ाई बिजली की रोशनी में हो रही है और गांव में नई ऊर्जा का संचार हुआ है।
गांव के बुजुर्ग माड़वी सुक्का ने भावुक होकर कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीवनकाल में गांव में बिजली देख पाएंगे। अब उन्हें महसूस हो रहा है कि उनका गांव भी देश की मुख्यधारा से जुड़ चुका है।
सुरक्षा बलों और प्रशासन की अहम भूमिका
इस बदलाव के पीछे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 74वीं बटालियन, जिला प्रशासन और पुलिस का संयुक्त प्रयास रहा। सुरक्षा कैंप स्थापित होने के बाद क्षेत्र में स्थिरता आई और विकास कार्यों का मार्ग प्रशस्त हुआ।
कलेक्टर अमित कुमार के नेतृत्व में स्कूल, आंगनबाड़ी और राशन दुकान जैसी मूलभूत सुविधाएं शुरू की गईं। प्रशासन का लक्ष्य जिले के अंतिम छोर तक बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा पहुंचाना है।
74वीं बटालियन के कमांडेंट हिमांशु पांडे ने कहा कि नक्सल प्रभाव के कारण यह गांव दशकों पीछे रह गया था, लेकिन अब यहां शांति और विकास का नया अध्याय शुरू हो चुका है।
बदलते बस्तर की मिसाल
गोगुंडा की यह रोशनी केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि बस्तर क्षेत्र में बदलते हालात की प्रतीक है। पहाड़ों और जंगलों के बीच बसे इस गांव में बिजली के खंभे गाड़ना साहस और संकल्प का परिणाम है।































