दीपावली को मां लक्ष्मी के आगमन, धन-धान्य और सुख-समृद्धि का पर्व माना जाता है। इस दिन घरों में दीप जलाकर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और कुबेर देव की पूजा की जाती है। रोशनी और उल्लास से भरे इस त्योहार पर कई परिवारों में पूजा के बाद ताश, चौपड़ या कौड़ियां खेलने की परंपरा भी निभाई जाती है। लेकिन दिवाली की रात खेल खेलने की यह परंपरा कैसे शुरू हुई और इसका पौराणिक आधार क्या है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी प्रचलित मान्यताओं के बारे में।

शिव-पार्वती की चौपड़ से जुड़ी है कहानी

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली की रात द्यूत क्रीड़ा यानी चौपड़ खेलने की परंपरा को भगवान शिव और माता पार्वती से जोड़ा जाता है। प्रचलित कथा के मुताबिक, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के बीच चौपड़ का खेल हुआ, जिसमें माता पार्वती की जीत हुई।

लोकमान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने वरदान दिया कि जो व्यक्ति दीपावली की रात द्यूत क्रीड़ा करेगा, उसके घर में पूरे साल सुख-समृद्धि बनी रहेगी। इसी कथा को कई जगह दिवाली की रात ताश या चौपड़ खेलने की परंपरा का आधार माना जाता है। हालांकि, इस मान्यता का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है।

पूजा के बाद खेल खेलने की परंपरा

कई परिवारों में लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद ताश, चौपड़ या कौड़ियों से खेल खेलने का रिवाज है। इसे केवल धार्मिक मान्यता से ही नहीं, बल्कि परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने तथा त्योहार की खुशियां साझा करने के अवसर के तौर पर भी देखा जाता है।

कुछ परिवार इसे शगुन के रूप में निभाते हैं, जबकि कई जगह यह केवल मनोरंजन का हिस्सा है। इस परंपरा को लेकर सभी परिवारों की मान्यताएं एक जैसी नहीं हैं।

पैसों का जुआ खेलने से क्यों किया जाता है परहेज?

दिवाली पर खेल खेलने की परंपरा का उद्देश्य आम तौर पर मनोरंजन, मेलजोल और खुशियां बांटना माना जाता है। इसे पैसों की बाजी या सट्टेबाजी से जोड़ना जरूरी नहीं है। पैसों का दांव लगाकर जुआ खेलने से आर्थिक नुकसान हो सकता है और परिवार में तनाव भी बढ़ सकता है।

इसलिए त्योहार पर खेल को मनोरंजन तक सीमित रखना बेहतर है। किसी धार्मिक परंपरा का पालन करने के लिए आर्थिक जोखिम उठाना आवश्यक नहीं है।

महाभारत और ऋग्वेद में भी बताए गए हैं जुए के नुकसान

भारतीय धार्मिक साहित्य में जुए के दुष्परिणामों का भी उल्लेख मिलता है। महाभारत में पांडवों और कौरवों के बीच हुए द्यूत प्रसंग में युधिष्ठिर सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। इस घटना के दौरान पांडवों को राज्य, संपत्ति और सम्मान से जुड़े गंभीर संकटों का सामना करना पड़ा। यह प्रसंग जुए के विनाशकारी परिणामों का उदाहरण माना जाता है।

वहीं, ऋग्वेद के अक्ष सूक्त में जुए की लत से परेशान व्यक्ति की पीड़ा का वर्णन मिलता है। इसमें जुए के प्रति आकर्षण और उसके कारण परिवार तथा सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों को सामने रखा गया है।

दीपावली पर खुशियों के साथ मर्यादा का भी रखें ध्यान

दीपावली का मुख्य संदेश सुख, शांति, सद्भाव और समृद्धि से जुड़ा है। शिव-पार्वती की चौपड़ से संबंधित कथा के आधार पर कुछ परिवारों में खेल खेलने की परंपरा निभाई जाती है, लेकिन इसे पैसों के जुए की अनिवार्यता नहीं समझना चाहिए।

त्योहार की असली खुशी परिवार के साथ समय बिताने, रिश्तों में मिठास बढ़ाने और दूसरों के जीवन में उजाला लाने में है। ऐसे में दीपावली की रात खेल को प्रतीकात्मक रस्म या मनोरंजन के रूप में अपनाना और आर्थिक जोखिम से बचना पर्व की भावना के अनुरूप है।

Leave a reply

Please enter your name here
Please enter your comment!