उम्मीदों और चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश

रायपुर/अम्बिकापुर। ऑल मीडिया प्रेस एसोसिएशन के सरगुजा संभाग अध्यक्ष अभिषेक कुमार सोनी ने केंद्रीय बजट 2026 पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह बजट ऐसे समय में प्रस्तुत किया गया है, जब देश की अर्थव्यवस्था को विकास की गति बनाए रखने के साथ-साथ महंगाई, रोजगार और सामाजिक असमानता जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह बजट सरकार के इरादों और नीतिगत दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है, लेकिन इसके प्रभाव का मूल्यांकन सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

बजट 2026 की सबसे बड़ी विशेषता इसका विकास-केंद्रित दृष्टिकोण है। बुनियादी ढांचे, सड़क निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के लिए बढ़े हुए प्रावधान यह संकेत देते हैं कि सरकार दीर्घकालिक विकास को प्राथमिकता दे रही है। इन क्षेत्रों में निवेश से सुविधाएँ बेहतर होने के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी उत्पन्न हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के विस्तार से निर्माण क्षेत्र में काम के अवसर बढ़ने की संभावना रहती है।राजस्व के मोर्चे पर सरकार ने आबकारी, कर तथा गैर-कर संसाधनों को सुदृढ़ करने की योजना बनाई है, जिससे विकास योजनाओं के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन जुटाए जा सकें। साथ ही सामाजिक सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण और कमजोर वर्गों के लिए योजनाओं को जारी रखना बजट का सकारात्मक पक्ष माना जा सकता है।

हालांकि बजट में कुछ सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन कई गंभीर चिंताएँ भी बनी हुई हैं। आंकड़ों की चमक और ज़मीनी हकीकत के बीच, बजट 2026 को सरकार भले ही विकासोन्मुख और संतुलित बताने का प्रयास कर रही हो, लेकिन गहराई से देखने पर यह आम जनता की वास्तविक चुनौतियों—महंगाई, रोजगार और आय—पर ठोस समाधान देने में अपेक्षाकृत कमजोर नजर आता है। वर्तमान में खाद्य पदार्थों, रसोई गैस, दवाइयों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की बढ़ती कीमतें आम आदमी की आय पर दबाव बना रही हैं, जबकि बजट में महंगाई को नियंत्रित करने के लिए कोई स्पष्ट और तात्कालिक उपाय दिखाई नहीं देता।रोजगार के सवाल पर बजट में कौशल विकास, स्टार्ट-अप और स्वरोजगार की बात तो की गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इससे प्रत्यक्ष रूप से कितने नए रोजगार सृजित होंगे। युवाओं की अपेक्षाओं के अनुरूप रोजगार सृजन के लिए ठोस और मापनीय लक्ष्य तय किए जाने की आवश्यकता थी, जो इस बजट में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता।

अनुभव यह भी बताते हैं कि कई बार बजट में घोषित योजनाएँ कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं और उनका लाभ ज़मीनी स्तर तक नहीं पहुँच पाता। वहीं राजस्व बढ़ाने के नाम पर कर और शुल्कों पर बढ़ता जोर यह आशंका पैदा करता है कि विकास का बोझ अंततः आम नागरिक की जेब पर डाला जा रहा है। अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि का असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ता है, जिसका सीधा प्रभाव मध्यम और निम्न आय वर्ग पर होता है, जबकि महंगाई पहले से ही उनकी क्रय-शक्ति को प्रभावित कर रही है।

बजट 2026 को न तो पूरी तरह जन-विरोधी कहा जा सकता है और न ही पूरी तरह जन-हितैषी। यह बजट राजस्व और विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश जरूर करता है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार घोषित योजनाओं को कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और ज़मीनी निगरानी के साथ लागू करती है। तभी यह बजट विकास के साथ-साथ आम जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतर सकेगा।

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