नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के दो नेताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान उम्र और जेनरेशन जेड को लेकर रोचक संवाद हुआ। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं की उम्र पूछी और जवाब मिलने के बाद टिप्पणी की कि दोनों नेता जेन-जी श्रेणी में नहीं आते। इस सुनवाई में प्रदर्शन, कानून-व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे भी उठे। सीजेपी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने अपनी न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन अदालत के सामने प्रक्रियात्मक सवाल उठने के बाद उन्होंने याचिका वापस ले ली।

उम्र बताने पर जज ने पूछा, क्या आप जेन-जी हैं

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता अभिक चिमनी से दोनों नेताओं की उम्र पूछी। वकील ने बताया कि सौरव दास 27 वर्ष के हैं, जबकि आशुतोष रांका की उम्र 32 वर्ष है।

इस पर न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि दोनों जेन-जी नहीं हैं और यह भी पूछा कि आखिर जेन-जी किसे कहा जाता है। अदालत में बताया गया कि सामान्य तौर पर वर्ष 1997 के आसपास या उसके बाद जन्मे लोगों को जेनरेशन जेड में शामिल किया जाता है।

सीजेपी के नेतृत्व में हाल के दिनों में हुए प्रदर्शनों को युवा आंदोलन के तौर पर पेश किए जाने के बीच अदालत की यह बातचीत सुनवाई का चर्चित हिस्सा बन गई।

न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती

सौरव दास और आशुतोष रांका ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के 19 अक्टूबर को जारी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस आदेश में दोनों की न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ाई गई थी।

यह मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और 170 के तहत शुरू की गई निवारक कार्रवाई से संबंधित है। दोनों नेताओं को 14 अक्टूबर को जंतर-मंतर इलाके में प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर प्रतिबंधात्मक आदेशों का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने के बाद दोनों नेताओं ने अदालत में आदेश को चुनौती दी। उनका मामला सुनवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध वैकल्पिक उपायों के सवालों तक पहुंच गया।

हाईकोर्ट ने पूछा, दूसरे कानूनी विकल्प का इस्तेमाल क्यों नहीं किया

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने इस बात पर सवाल उठाया कि याचिकाकर्ताओं ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए सीधे हाईकोर्ट का रुख क्यों किया। अदालत ने पूछा कि जब आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने का विकल्प मौजूद था, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका क्यों दायर की गई।

अदालत की इस टिप्पणी का संबंध मामले में अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया से था। न्यायिक आदेशों को चुनौती देते समय उपलब्ध वैधानिक उपायों और उचित प्रक्रिया के महत्व पर भी सुनवाई के दौरान चर्चा हुई।

प्रदर्शन की अनुमति और बैरिकेड तोड़ने को लेकर भी उठे सवाल

अदालत में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन और वहां लागू प्रतिबंधात्मक आदेशों के कथित उल्लंघन को लेकर भी सवाल किए गए। न्यायाधीश ने प्रदर्शन की अनुमति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की।

सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि यदि आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग ही बैरिकेड तोड़ते हैं, तो भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। ये टिप्पणियां सुनवाई के दौरान सामने आई थीं। इन्हें मामले के सभी तथ्यों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

अदालत में दिल्ली पुलिस और सीजेपी नेताओं की ओर से पेश हुए वकील

मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और अधिवक्ता आशीष दीक्षित उपस्थित हुए। वहीं, सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से अधिवक्ता अभिक चिमनी ने पक्ष रखा।

अदालत द्वारा उठाए गए प्रक्रियात्मक सवालों के बाद दोनों याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस लेने का निर्णय लिया। हाईकोर्ट ने उन्हें याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। इसका मतलब है कि याचिका वापस लिए जाने को हिरासत बढ़ाने के आदेश पर हाईकोर्ट की अंतिम मुहर या उसके खिलाफ अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। संबंधित पक्ष कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपना सकते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन के बाद बढ़ा विवाद

सीजेपी नेताओं की गिरफ्तारी और हिरासत का मामला संगठन के विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। संगठन के नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान प्रतिबंधात्मक आदेशों के कथित उल्लंघन और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के आधार पर कार्रवाई की थी।

इस घटनाक्रम के बीच सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने प्रदर्शनकारियों से फिलहाल आंदोलन रोककर घर लौटने की अपील की है। गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी स्तर पर चर्चा जारी है।

जेन-जी पर टिप्पणी के साथ कानूनी प्रक्रिया भी रही सुनवाई के केंद्र में

दिल्ली हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान दोनों नेताओं की उम्र और जेनरेशन जेड को लेकर न्यायमूर्ति की टिप्पणी चर्चा में रही। हालांकि, मामले का कानूनी पक्ष न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश, निवारक कार्रवाई और उसे चुनौती देने के लिए उपलब्ध न्यायिक उपायों से जुड़ा था।

याचिका वापस लिए जाने के बाद हाईकोर्ट ने मामले के मूल विवाद पर कोई अंतिम राय नहीं दी। अब आगे की कानूनी कार्रवाई और संबंधित पक्षों की ओर से अपनाए जाने वाले विकल्प इस मामले की अगली दिशा तय करेंगे।

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