
नवनेथम नावी पिल्लई का नाम मानवाधिकारों की रक्षा, नस्लीय भेदभाव के विरोध और अंतरराष्ट्रीय न्याय को मजबूत करने के प्रयासों से जुड़ा है। दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं पिल्लई ने अपने लंबे कानूनी करियर के दौरान उन लोगों के अधिकारों के लिए काम किया, जिन्हें भेदभाव और अन्याय का सामना करना पड़ा। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं और युद्ध अपराधों तथा नरसंहार जैसे गंभीर मामलों में जवाबदेही की पैरवी की।
रंगभेद के दौर में वकालत से बनाई पहचान
नावी पिल्लई ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ संघर्ष के दौरान वकील के रूप में काम किया। उन्होंने नेल्सन मंडेला समेत कई लोगों को कानूनी सहायता दी। उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने कानून को केवल अदालती कार्यवाही तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानवाधिकारों की रक्षा और भेदभाव के खिलाफ संघर्ष का माध्यम बनाया।
संयुक्त राष्ट्र में निभाई अहम जिम्मेदारी
पिल्लई ने 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त के पद पर काम किया। इस भूमिका में उन्होंने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मानवाधिकारों के उल्लंघन, नागरिक स्वतंत्रता और कमजोर समुदायों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर काम किया।
महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में भी उनका योगदान रहा है। वह अंतरराष्ट्रीय महिला अधिकार संगठन इक्वैलिटी नाउ की सह-संस्थापकों में शामिल हैं। इस संगठन का उद्देश्य महिलाओं और लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लिए कानूनी और नीतिगत बदलावों को बढ़ावा देना है।
दक्षिण अफ्रीका की हाईकोर्ट में पहली अश्वेत महिला न्यायाधीश
नावी पिल्लई ने न्यायपालिका में भी ऐतिहासिक पहचान बनाई। वर्ष 1995 में उन्हें दक्षिण अफ्रीका के हाईकोर्ट में कार्यवाहक न्यायाधीश नियुक्त किया गया। वह इस अदालत में नियुक्त होने वाली पहली अश्वेत महिला थीं। उनकी यह उपलब्धि उस दौर में खास महत्व रखती थी, जब दक्षिण अफ्रीका रंगभेद की विरासत से बाहर निकलकर अधिक समानतापूर्ण व्यवस्था की ओर बढ़ रहा था।
डोनाल्ड ट्रंप को लेकर भी चर्चा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर नोबेल शांति पुरस्कार पाने की अपनी इच्छा जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को रोकने में अपनी भूमिका का भी उल्लेख किया है। पुरस्कार की घोषणा के समय उनका नाम चर्चा में रहा, लेकिन किसी भी वर्ष पुरस्कार किसे दिया जाएगा, इसका फैसला नोबेल समिति स्वतंत्र रूप से करती है।




















