इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर से सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। खजराना क्षेत्र में जिस 100 बिस्तरों वाले सिविल अस्पताल की न तो अब तक जमीन तय हो सकी है और न ही निर्माण शुरू हुआ है, उसी अस्पताल के नाम पर पिछले छह वर्षों से कर्मचारियों के पद स्वीकृत हैं। इतना ही नहीं, वहां नियमित रूप से स्टाफ की पोस्टिंग और तबादले भी किए जा रहे हैं।

2020 में हुई थी अस्पताल की घोषणा

वर्ष 2020 में सरकार ने इंदौर के खजराना क्षेत्र में 100 बेड के सिविल अस्पताल की घोषणा की थी। अस्पताल के संचालन के लिए 87 पदों को भी मंजूरी दे दी गई थी। लेकिन वर्ष 2026 तक अस्पताल के लिए जमीन तक तय नहीं हो सकी। ऐसे में पूरा प्रोजेक्ट केवल सरकारी फाइलों तक ही सीमित रह गया।

तीन लाख से ज्यादा आबादी, फिर भी अस्पताल का इंतजार

खजराना और आसपास के क्षेत्र में बड़ी आबादी निवास करती है। स्थानीय लोगों को सरकारी इलाज के लिए करीब चार किलोमीटर दूर स्थित अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। लंबे समय से अस्पताल बनने की घोषणा के बावजूद स्वास्थ्य सुविधा आज तक धरातल पर नहीं उतर सकी।

अस्पताल नहीं, लेकिन पोस्टिंग जारी

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अस्पताल का अस्तित्व नहीं होने के बावजूद उसके नाम पर कर्मचारियों की नियुक्तियां और स्थानांतरण लगातार किए जा रहे हैं। 15 जून 2026 को जारी एक आदेश में भी एक लैब टेक्नीशियन की पोस्टिंग खजराना सिविल अस्पताल के नाम पर की गई है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब अस्पताल बना ही नहीं है तो वहां पदस्थ कर्मचारी आखिर किस स्थान पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यदि वे अन्य अस्पतालों में कार्यरत हैं तो फिर खजराना अस्पताल के नाम पर पोस्टिंग करने का औचित्य क्या है।

कागजों में अस्पताल, मरीज अब भी परेशान

स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल का लाभ उन्हें अब तक नहीं मिल पाया है। दूसरी ओर सरकारी रिकॉर्ड में अस्पताल के लिए पूरा स्टाफ स्वीकृत और पदस्थ दिखाया जा रहा है। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जमीन का मामला छह साल से अटका

जानकारी के अनुसार अस्पताल के लिए जमीन आवंटन का मामला पिछले छह वर्षों से लंबित है। कई प्रस्ताव और बैठकों के बावजूद न तो जमीन तय हो सकी और न ही निर्माण कार्य शुरू हुआ। इसका सीधा असर क्षेत्र के हजारों मरीजों पर पड़ रहा है, जिन्हें इलाज के लिए अन्य सरकारी अस्पतालों में जाना पड़ता है।

उठ रहे हैं कई बड़े सवाल

इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब अस्पताल के लिए जमीन ही उपलब्ध नहीं थी तो 87 पदों को मंजूरी क्यों दी गई? यदि पद स्वीकृत थे तो अस्पताल निर्माण में इतनी देरी क्यों हुई? और आखिर छह वर्षों तक केवल कागजों में अस्पताल चलाने की जिम्मेदारी किसकी है? अब देखना होगा कि इस मामले में प्रशासन क्या जवाब देता है और अस्पताल निर्माण की दिशा में कब तक ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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