

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के कई सांसदों ने लोकसभा में अलग गुट यानी फ्रैक्शन बनाने की मांग कर दी है, जिससे राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं।
लोकसभा अध्यक्ष को भेजा गया औपचारिक पत्र
जानकारी के अनुसार, बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक औपचारिक पत्र भेजकर संसद के भीतर अलग पहचान और स्वतंत्र बैठने की व्यवस्था की मांग की है। यह पत्र अब सार्वजनिक हो चुका है और इसमें कई सांसदों के हस्ताक्षर भी शामिल हैं।
सूत्रों का कहना है कि सांसदों ने दावा किया है कि पार्टी के भीतर उनकी आवाज को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा था, जिसके चलते उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।
काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में तैयार हुआ पत्र
बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले में काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में यह पत्र तैयार किया गया है। सांसदों का कहना है कि वे संसद के भीतर एक अलग समूह के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, ताकि उनकी राजनीतिक और संसदीय भूमिका स्पष्ट रूप से दर्ज हो सके।
किन सांसदों ने किए हस्ताक्षर
इस पत्र पर जिन सांसदों के हस्ताक्षर सामने आए हैं, उनमें कई बड़े नाम शामिल हैं—
काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय, बापी हलदर, डॉ. शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश बर्मा बसुनिया, असित कुमार मल, अरूप चक्रवर्ती, रचना बनर्जी, सायोनी घोष, खलीलुर्रहमान, अबू ताहिर खान, यूसुफ पठान, मिताली बैग, माला रॉय, कालीपद सोरेन, दीपक अधिकारी, जून मालिया और पार्थ भौमिक।
पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष बना चर्चा का विषय
इन सांसदों के सामूहिक कदम को पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मजबूत संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह घटनाक्रम टीएमसी के भीतर लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर रहा है।
अब फैसला लोकसभा अध्यक्ष के हाथ में
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला अब इस पत्र पर संसदीय नियमों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय लेंगे। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस पर बड़ा फैसला सामने आ सकता है, जो संसद की राजनीति में अहम बदलाव ला सकता है।
आगे क्या होगा, सबकी नजर फैसले पर
टीएमसी सांसदों की इस मांग ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या लोकसभा में वास्तव में अलग गुट को मान्यता मिलेगी या फिर यह मामला राजनीतिक संवाद और समझाइश के जरिए सुलझाया जाएगा।





















