देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के हालिया फैसलों ने ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के दायरे और उपयोग को लेकर नई दिशा तय की है

छत्तीसगढ़ में नक्सल क्षेत्र का हवाला देकर सूचना से कर देते हैं इनकार, पत्रकार और कार्यकर्ता असुरक्षित

अभिषेक कुमार सोनी ✍️

नई दिल्ली/छत्तीसगढ़/रायपुर।भारत में लोकतंत्र की बुनियाद मानी जाने वाली सूचना की आज़ादी आज भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।जमीनी स्तर पर यह अधिकार कई बार गोपनीयता की दीवार से टकरा जाता है। एक ओर सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को सरकार से जानकारी मांगने का अधिकार देता है, तो दूसरी ओर ऑफिसियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 सरकारी सूचनाओं को गोपनीय घोषित कर उन्हें सार्वजनिक होने से रोकने की ताकत देता है। यही कारण है कि इन दोनों कानूनों के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है, जिसका असर छत्तीसगढ़ जैसे संवेदनशील राज्यों में अधिक दिखाई देता है।

ऑफिसियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 मूल रूप से ब्रिटिश शासन के दौरान बनाया गया था, जिसका उद्देश्य राज्य की गोपनीय सूचनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। इस कानून के तहत किसी भी संवेदनशील दस्तावेज को साझा करना या लीक करना अपराध माना जाता है। इसकी विशेषता यह है कि “गोपनीय” शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, जिससे इसका दायरा बेहद व्यापक हो जाता है और आम नागरिक से लेकर पत्रकार तक इसके दायरे में आ सकते हैं। इस कानून के तहत तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

दूसरी ओर, 2005 में लागू हुआ सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया था। यह कानून नागरिकों को सरकारी विभागों से जानकारी मांगने का अधिकार देता है, जिसमें सामान्य मामलों में 30 दिनों के भीतर और जीवन या स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 48 घंटे के भीतर जवाब देना अनिवार्य है। आरटीआई ने शासन व्यवस्था को अधिक खुला और उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।हालांकि, जब ये दोनों कानून आमने-सामने आते हैं, तो विवाद की स्थिति बनती है। जहां ऑफिसियल सीक्रेट्स एक्ट गोपनीयता को प्राथमिकता देता है, वहीं आरटीआई पारदर्शिता को अधिकार मानता है। न्यायिक व्याख्याओं में यह स्पष्ट किया गया है कि कई मामलों में आरटीआई एक्ट प्रभावी हो सकता है, लेकिन व्यवहार में अधिकारी अक्सर ऑफिसियल सीक्रेट्स एक्ट का हवाला देकर सूचना देने से इनकार कर देते हैं।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र बोलकर छत्तीसगढ़ में जानकारियां कर दी जाती है सीमित

छत्तीसगढ़ में इसका प्रभाव और अधिक स्पष्ट नजर आता है। राज्य के कई हिस्से नक्सल प्रभावित हैं, जहां सुरक्षा अभियानों के कारण सूचनाओं को गोपनीय बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिकता होती है। इसके चलते आरटीआई के तहत मांगी गई कई जानकारियां राष्ट्रीय सुरक्षा या संवेदनशील बताकर रोक दी जाती हैं।इससे प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रभाव पड़ता है और नागरिकों के लिए जानकारी प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्यॉरिटी एक्ट जैसे कानून भी प्रशासन को अतिरिक्त अधिकार देते हैं, जिससे सूचना नियंत्रण और मजबूत होता है।जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि सूचना मांगना हमेशा आसान नहीं होता। कई मामलों में आरटीए कार्यकर्ताओं को दबाव, धमकी या हमलों का सामना करना पड़ता है, जबकि बड़ी संख्या में आवेदन “गोपनीयता” के आधार पर खारिज कर दिए जाते हैं।नतीजतन, आम नागरिक के लिए यह समझ पाना कठिन हो जाता है कि कौन सी जानकारी वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है इससे यह सवाल उठता है कि क्या पारदर्शिता का अधिकार वास्तव में पूरी तरह लागू हो पा रहा है।

पत्रकारों पर कई मामले दर्ज कर भेजा गया जेल, आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हुए हमले

भारत में पिछले एक दशक के दौरान पत्रकारिता पर कानूनी और प्रशासनिक दबाव के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और स्वतंत्र संगठनों के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 से 2020 के बीच 150 से अधिक पत्रकार गिरफ्तार, हिरासत में लिए गए या पूछताछ का सामना करने को मजबूर हुए। इनमें से कई मामलों में पत्रकारों की रिपोर्टिंग खासतौर पर संवेदनशील मुद्दों को उजागर करना कार्रवाई का प्रमुख कारण बना।सिर्फ वर्ष 2020 में ही 60 से अधिक पत्रकारों पर कार्रवाई दर्ज की गई, जिसमें गिरफ्तारी, एफआईआर, नोटिस और पूछताछ शामिल है। इन मामलों में कई बार ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट , 1923, राजद्रोह, आईटी कानून और अन्य आपराधिक धाराओं का इस्तेमाल किया गया, जिससे यह सवाल उठता रहा कि क्या कानूनों का उपयोग सुरक्षा के लिए हो रहा है या असहमति को नियंत्रित करने के लिए।

इस संदर्भ में कुछ प्रमुख मामले भी सामने आए हैं। इफ्तिखार गिलानी को 2002 में रक्षा से जुड़े दस्तावेज रखने के आरोप में ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था, हालांकि बाद में आरोप कमजोर पड़ने पर मामला वापस ले लिया गया। इसी तरह राजीव शर्मा को 2020 में संवेदनशील रक्षा सूचनाएं साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, जिसने एक बार फिर इस कानून के इस्तेमाल को लेकर बहस को तेज कर दिया।इसके अलावा, कई मामलों में पत्रकारों पर सेना, पुलिस या सुरक्षा अभियानों से जुड़ी रिपोर्टिंग के कारण केस दर्ज किए गए। मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का उपयोग भले ही सीमित मामलों में होता हो, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक होता है। यह पत्रकारों के बीच एक ऐसा माहौल तैयार करता है, जहां संवेदनशील विषयों पर रिपोर्टिंग करते समय कानूनी जोखिम का डर बना रहता है।एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा है कि “कानूनी कार्रवाई का डर ही सबसे बड़ा नियंत्रण बन जाता है, जिससे सेल्फ-सेंसरशिप बढ़ती है।"

महिला यूट्यूबर पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तार

2025–26 के दौरान एक यूट्यूबर पर पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत कार्रवाई की गई, जिसमें अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया। यह मामला इस बात की ओर संकेत करता है कि डिजिटल माध्यमों पर साझा की जाने वाली जानकारी भी अब राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में आ रही है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अन्य मामले में कहा कि यदि कोई दस्तावेज ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत “टॉप सीक्रेट” घोषित है, तो उसे अदालत या ट्रिब्यूनल में भी अनिवार्य रूप से प्रस्तुत नहीं कराया जा सकता। इस निर्णय ने सूचना के अधिकार और गोपनीयता के बीच संतुलन को लेकर नई चर्चा को जन्म दिया है। इन फैसलों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि न्यायालय अब ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के उपयोग में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं जहां राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कठोरता बरती जा रही है, वहीं सामान्य प्रशासनिक मामलों में इसके अति-प्रयोग को सीमित करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

आरटीआई कार्यकर्ताओं ने जान देकर चुकाई अधिकारों की कीमत , झेले कई हमले

जहां पत्रकारों पर कानूनी दबाव बढ़ा है, वहीं आम नागरिकों के लिए बने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का इस्तेमाल भी कई बार जोखिम भरा साबित हुआ है। इस कानून ने नागरिकों को सरकार से जवाब मांगने का अधिकार जरूर दिया, लेकिन इसके इस्तेमाल के दौरान कई लोगों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े हैं।देशभर में आरटीआई से जुड़े मामलों में 300 से अधिक हमले और उत्पीड़न के मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जबकि 50 से ज्यादा आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या होने की बात विभिन्न रिपोर्टों में सामने आई है। ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि सूचना मांगना कई बार जानलेवा भी साबित हो सकता है।जमीनी स्तर पर देखा जाए तो आरटीआई कार्यकर्ता अक्सर स्थानीय भ्रष्टाचार, जमीन विवाद, सरकारी योजनाओं में अनियमितता और फर्जीवाड़े से जुड़े मामलों को उजागर करते हैं। यही कारण है कि उन्हें सीधे स्थानीय हितों से टकराव का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में आवेदकों को धमकियां दी जाती हैं, झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की शिकायतें सामने आती हैं,  जबकि सामाजिक और राजनीतिक दबाव भी बनाया जाता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ऐसे मामलों में पुलिस सुरक्षा अक्सर पर्याप्त नहीं होती।छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसे मामलों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक देखी गई है, जहां सूचना मांगने वालों पर सीधे हमले तक हुए हैं।

अभिषेक कुमार सोनी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऑफिशल सीक्रेट्स एक्ट और आरटीआई एक्ट के बीच संतुलन बनाना समय की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर पारदर्शिता को सीमित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह संतुलन और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है।

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