

नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि 2026 के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन भक्त पूरे विधि-विधान से देवी दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की आराधना करते हैं। श्वेत वस्त्र धारण करने वाली मां को ज्ञान, तप, संयम और आत्मबल की प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई मां ब्रह्मचारिणी पूजा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था। देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। प्रारंभ में उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल फल और फूल ग्रहण किए और बाद में कठिन परिस्थितियों में भी अपनी साधना जारी रखी।
तपस्या के अगले चरण में मां ने केवल बेलपत्र का सेवन किया और अंत में उसे भी त्याग दिया, जिसके कारण उन्हें ‘अपर्णा’ नाम से जाना गया। उन्होंने निर्जल रहकर भी तप किया। उनकी इस अटूट साधना और दृढ़ संकल्प के कारण ही उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया।
कहा जाता है कि भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए ऋषि का रूप धारण किया, लेकिन मां अपने संकल्प से डिगीं नहीं। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
मां ब्रह्मचारिणी पूजा के दौरान आरती और व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धा से की गई आरती से जीवन में सुख, शांति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूजा न केवल आध्यात्मिक शक्ति देती है, बल्कि जीवन की कठिनाइयों को दूर करने में भी सहायक होती है।

































