


मध्य प्रदेश : में डिजिटल इंडिया के दौर में साइबर अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रदेश साइबर सुरक्षा के बुनियादी ढांचे के मामले में पिछड़ता दिख रहा है। पिछले पांच वर्षों में ऑनलाइन ठगी, बैंकिंग फ्रॉड और हैकिंग के मामले तेजी से बढ़े हैं, जिनमें लोगों ने करोड़ों रुपये गंवाए हैं। इसके बावजूद, प्रदेश में अब तक साइबर फॉरेंसिक लैब स्थापित करने का कोई ठोस प्रस्ताव नहीं बना।
साइबर अपराध के आंकड़े
सरकारी रिकॉर्ड्स के अनुसार, प्रदेश में लगभग हर दसवां व्यक्ति साइबर ठगी का शिकार हो चुका है। ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड, फर्जी कॉल, सोशल मीडिया अकाउंट हैकिंग और निवेश योजनाओं के माध्यम से ठगी आम हो गई है। शिकायतें दर्ज की जा रही हैं, लेकिन तकनीकी साक्ष्य जुटाने और जांच करने में पुलिस को लगातार दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
अन्य राज्यों की तुलना
देश के छोटे और सीमावर्ती राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, पुडुचेरी, अरुणाचल प्रदेश आदि में साइबर फॉरेंसिक लैब स्थापित है। वहीं, मध्य प्रदेश, सिक्किम और नागालैंड जैसे कुछ ही राज्यों में लैब नहीं है। यह चिंता का विषय है क्योंकि मध्य प्रदेश साइबर अपराध के मामलों में लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है।
लैब न होने के प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि लैब न होने पर मोबाइल, लैपटॉप, ई-मेल और डिजिटल ट्रांजैक्शन से जुड़े सबूतों की जांच में देरी होती है। कई मामलों में तकनीकी रिपोर्ट अन्य राज्यों से मंगानी पड़ती है, जिससे केस कमजोर हो जाते हैं और आरोपी बच जाते हैं।
सवाल सरकार के लिए
प्रदेश में साइबर अपराध बढ़ने और करोड़ों रुपये का नुकसान होने के बावजूद फॉरेंसिक लैब के लिए कोई रोडमैप न होना अब सरकार के लिए गंभीर सवाल बन चुका है। विपक्ष इसे प्रशासन की लापरवाही बता रहा है।
































