सागर: विद्या और ज्ञान की देवी के रूप में मां वाग्देवी (सरस्वती) के पूजन का विशेष महत्व है. वैसे तो अन्य देवी देवताओं की तरह मां सरस्वती के मंदिर कम नजर आते हैं, लेकिन बुंदेलखंड अंचल में सदियों पुरानी प्रतिमाओं में मां सरस्वती के पूजन की जानकारी मिलती है. खासकर सनातन धर्म में मां सरस्वती को जिस तरह दर्शाया गया है, वैसी 800 साल पुरानी मूर्ति सागर के जिला पुरातत्व संग्रहालय में मौजूद है. इस प्रतिमा में मां वाग्देवी ज्ञान और विद्या के प्रतीक धारण किए हुए हैं. खास बात ये है कि मां सरस्वती के पूजन का महत्व जैन और बौद्ध धर्म में भी बताया गया है. इस प्राचीन प्रतिमा को हिंदू शास्त्रों में मां सरस्वती के रूप में वर्णन किया गया है.

जिला पुरातत्व संग्रहालय में मौजूद प्रतिमा

सागर जिला पुरातत्व संग्रहालय में बुंदेलखंड अंचल में मिली कई प्राचीन और ऐतिहासिक प्रतिमाएं मौजूद हैं. यहां पर मां सरस्वती की ऐसी प्रतिमा मौजूद है, जो 12 वीं शताब्दी की है. इन्हीं में से एक प्रतिमा है वाग्देवी की, जो करीब 800 साल पुरानी है. यह प्रतिमा देवरी से प्राप्त हुई थी. प्रतिमा के कई हिस्से खंडित हो चुके हैं और चेहरा भी स्पष्ट रूप नहीं दिखाई देता है.

संग्रहालय के प्रभारी सुजीत पुरी गोस्वामी बताते हैं कि “हमारे यहां मौजूद देवी सरस्वती की प्रतिमा 12वीं शताब्दी की है, जो देवरी से प्राप्त हुई थी. प्रतिमा के चेहरे पर कुछ क्षरण हो गया है और कुछ हिस्सा खंडित हो गया है, लेकिन ये प्रतिमा कई मायनों में विशिष्ट है.”

शास्त्रों में वर्णन अनुसार निर्मित है प्रतिमा

संग्रहालय प्रभारी सुजीत पुरी गोस्वामी बताते हैं कि “इस प्रतिमा की खास बात ये है कि इसको हिंदू शास्त्रों में वर्णित मां वाग्देवी के रूप के आधार पर निर्मित किया गया है. मां सरस्वती की 4 भुजाएं होती हैं, जिन्हें हिंदू शास्त्रों में मन, बुद्धि, चेतना और अहंकार के प्रकटीकरण के तौर पर दर्शाया गया है. मां सरस्वती की प्रतिमा में जिन 4 वस्तुओं को दर्शाया गया है, वो भी अलग-अलग प्रतीक है.

उन्होंने आगे बताया कि “मां वाग्देवी के हाथ में मौजूद वीणा, कला और संगीत के प्रतीक है. वहीं, मां सरस्वती के एक हाथ में पांडुलिपि दर्शायी गई है, जो ज्ञान और विद्या का प्रतीक है. इनके एक हाथ में अक्षमाला को दर्शाया गया है, जो एकाग्रता, ध्यान और निरंतर अध्ययन का प्रतीक होती है. मां वाग्देवी के एक हाथ में कमल भी दर्शाया गया है, जो आत्मज्ञान का प्रतीक है. वहीं मां हंस पर विराजमान हैं, जो अच्छे और बुरे की पहचान का प्रतीक होता है.”

संग्रहालय के प्रभारी सुजीत पुरी गोस्वामी बताते हैं कि “हमारे यहां मौजूद देवी सरस्वती की प्रतिमा 12वीं शताब्दी की है, जो देवरी से प्राप्त हुई थी. प्रतिमा के चेहरे पर कुछ क्षरण हो गया है और कुछ हिस्सा खंडित हो गया है, लेकिन ये प्रतिमा कई मायनों में विशिष्ट है.”

शास्त्रों में वर्णन अनुसार निर्मित है प्रतिमा

संग्रहालय प्रभारी सुजीत पुरी गोस्वामी बताते हैं कि “इस प्रतिमा की खास बात ये है कि इसको हिंदू शास्त्रों में वर्णित मां वाग्देवी के रूप के आधार पर निर्मित किया गया है. मां सरस्वती की 4 भुजाएं होती हैं, जिन्हें हिंदू शास्त्रों में मन, बुद्धि, चेतना और अहंकार के प्रकटीकरण के तौर पर दर्शाया गया है. मां सरस्वती की प्रतिमा में जिन 4 वस्तुओं को दर्शाया गया है, वो भी अलग-अलग प्रतीक है.

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