मध्य प्रदेश : दमोह से सामने आया एक ताजा आदेश प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग द्वारा 23 अप्रैल 2026 को जारी निर्देश ने एक ओर जहां फर्जीवाड़े पर सख्ती के संकेत दिए हैं, वहीं दूसरी ओर सिस्टम की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है।


5 दिन की मोहलत या सिर्फ औपचारिकता, असली परीक्षा अब शुरू

विभाग ने तेंदूखेड़ा नगर पालिका अधिकारी को स्पष्ट निर्देश देते हुए 5 दिनों के भीतर FIR दर्ज करने और पूरी कार्रवाई पूरी करने का अल्टीमेटम दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह कार्रवाई जमीन पर असर दिखाएगी या सिर्फ फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगी। जब भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हों, तो क्या स्थानीय प्रशासन उन तक पहुंच पाएगा?


नौरादेही विस्थापन नीति में मुआवजे का खेल, ‘जादुई सर्टिफिकेट’ का खुलासा

नौरादेही अभयारण्य से जुड़े विस्थापन नियमों के तहत तय कटऑफ डेट के अनुसार 18 वर्ष पूर्ण कर चुके व्यक्ति को एक यूनिट मानते हुए 15 लाख रुपये मुआवजा देने का प्रावधान है। वहीं, 18 वर्ष से कम आयु के दिव्यांग बच्चों को भी मेडिकल प्रमाणन के आधार पर अलग यूनिट मानकर समान मुआवजा दिया जाना है।

इसी प्रावधान का फायदा उठाते हुए जालसाजों ने फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट बनाने का बड़ा नेटवर्क खड़ा कर लिया। सैकड़ों बच्चों को मानसिक रूप से अस्वस्थ दिखाकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और बदले में मुआवजा राशि का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा लेने की सौदेबाजी की गई।


करन उपाध्याय का नाम आया सामने, लाखों के घोटाले की साजिश नाकाम

इस पूरे प्रकरण में करन उपाध्याय नामक युवक की भूमिका सामने आई है, जिसने कथित तौर पर फर्जी सर्टिफिकेट और कूट रचित दस्तावेजों के जरिए लाखों रुपये की मुआवजा राशि हासिल करने की योजना बनाई थी। बताया जा रहा है कि अपने साथियों के साथ मिलकर वह 15 लाख रुपये के भुगतान की तैयारी में था, लेकिन समय रहते मामला उजागर हो गया।


सवाल सिस्टम पर, सिर्फ आरोपी नहीं बल्कि जिम्मेदारों की भूमिका भी जांच के घेरे में

यह मामला केवल एक व्यक्ति की धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है। असली सवाल उन अधिकारियों पर भी उठ रहा है, जिन्होंने ऐसे दस्तावेजों को वैध मानते हुए प्रक्रिया आगे बढ़ाई। क्या जांच केवल आरोपी तक सीमित रहेगी या उस पूरी व्यवस्था की भी पड़ताल होगी, जिसने एक सामान्य व्यक्ति को कागजों में दिव्यांग बना दिया?


जांच का खेल या सख्त कार्रवाई, नगर पालिका की भूमिका पर नजर

अक्सर देखा जाता है कि विभागीय जिम्मेदारियां एक-दूसरे पर डालकर समय निकाल लिया जाता है। विभाग ने निर्देश जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है, अब निगाहें नगर पालिका प्रशासन पर टिकी हैं। क्या वास्तव में FIR दर्ज कर कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी कागजी प्रक्रिया में उलझ जाएगा?


दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग पर ही सवाल, निगरानी व्यवस्था क्यों हुई ‘कमजोर’

विडंबना यह है कि जिस विभाग का उद्देश्य दिव्यांगजनों को सशक्त बनाना है, उसी की निगरानी प्रणाली इतनी कमजोर कैसे साबित हुई कि इस तरह का फर्जीवाड़ा संभव हो गया। यह केवल एक केस नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल है।


क्या 5 दिन में मिलेगा न्याय या फिर फाइलों में दब जाएगा मामला

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि 5 दिन की तय समयसीमा में क्या ठोस कार्रवाई होती है। क्या दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा। असली परीक्षा अब प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जवाबदेही की है।

Leave a reply

Please enter your name here
Please enter your comment!