जिला प्रशासन द्वारा जांच कराए जाने को लेकर निष्पक्षता पर सवाल..?

अम्बिकेश गुप्ता

कुसमी। बहुचर्चित हंसपुर हत्या कांड के बीच जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। तहसीलदार कार्यालय द्वारा जारी एक नोटिस ने पूरे मामले को और उलझा दिया है, जिसमें संबंधित पक्षों को बयान दर्ज कराने के लिए उपस्थित होने का निर्देश तो दिया गया है, लेकिन स्थान का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है।

जारी नोटिस में ग्राम पंचायत हंसपुर के सरपंच व अन्य संबंधितों को दिनांक 11 अप्रैल 2026 को जांच दल के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा गया है। हालांकि, नोटिस में यह नहीं बताया गया कि उन्हें किस स्थान पर उपस्थित होना है। इस तरह की अधूरी सूचना से ग्रामीणों में भ्रम और असमंजस की स्थिति बन गई है।

पुलिस जांच के बीच राजस्व विभाग की समानांतर कार्रवाई पर सवाल

हंसपुर में हुए हत्या मामले की जांच पहले से ही पुलिस द्वारा की जा रही है। ऐसे में राजस्व विभाग द्वारा अलग से जांच प्रक्रिया शुरू करना कई सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह कदम जांच को प्रभावित करने या भटकाने की कोशिश भी हो सकता है।

निलंबित एसडीएम से जुड़े आरोपों ने बढ़ाई संवेदनशीलता..

मामले को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि अंबिकापुर की सेंट्रल जेल में बंद निलंबित एसडीएम करुण डहरिया पहले से ही हत्या के आरोप में गिरफ्तार हैं। उनके कार्यकाल के दौरान बॉक्साइट के अवैध उत्खनन जैसे आरोप भी सामने आ चुके हैं। ऐसे में उसी विभाग द्वारा जांच कराए जाने को लेकर निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

ग्रामीणों में पहले से आक्रोश, अब नोटिस से बढ़ी नाराजगी..

हंसपुर में हुए इस बहुचर्चित हत्याकांड को लेकर ग्रामीणों में पहले से ही आक्रोश व्याप्त है। लोगों का कहना है कि घटना के बाद से लगातार निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है, लेकिन अब प्रशासनिक स्तर पर उठाए जा रहे कदम उल्टा भ्रम और अविश्वास पैदा कर रहे हैं।

रिमांड पर लाने पर भी हुआ था विरोध..

ग्रामीणों की नाराजगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विगत दिनों जब हत्या के आरोपित व निलंबित पूर्व एसडीएम करुण कुमार डहरिया को पुलिस रिमांड पर पूछताछ के लिए हंसपुर गांव लाया गया था, तब भी स्थानीय लोगों में उक्त आरोपी के प्रति नराजगी देखने को मिली थी। लोगों का कहना था कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, लेकिन किसी भी प्रकार की कार्रवाई पारदर्शी और स्पष्ट होनी चाहिए।

जल्दबाजी में नोटिस, दो दिन में उपस्थित होने का निर्देश..

नोटिस जारी होने के मात्र दो दिन के भीतर उपस्थित होने का निर्देश भी लोगों को खटक रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि इतनी कम समयसीमा में बिना स्पष्ट जानकारी के उपस्थित होना व्यावहारिक नहीं है, जिससे यह कदम दबाव बनाने जैसा प्रतीत होता है।

आदिवासी क्षेत्र में घटना, संवेदनशीलता की मांग..

प्रदेश में आदिवासी नेतृत्व होने के बावजूद आदिवासी क्षेत्र में इस तरह की घटना और उसके बाद की कार्यवाही पर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोग इसे प्रशासनिक संवेदनशीलता की कमी मान रहे हैं। इस मामले ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। क्या प्रशासन इन सवालों का क्या जवाब देता है और जांच कितनी निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ती है। इस ओर सभी की निगाहे टिकी हुई हैं।

उठते सवाल..?

1. बिना स्थान बताए बयान दर्ज कराने का नोटिस क्यों?
2. पुलिस जांच के बीच राजस्व विभाग की समानांतर जांच का औचित्य क्या?
3. क्या यह प्रक्रिया जांच को प्रभावित करने की कोशिश है?

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